कोटा। राजस्थान के कोटा में विजयादशमी के अवसर पर 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले में परंपरा और आधुनिक तकनीक का शानदार संगम देखने को मिला। इस बार मेले का सबसे बड़ा आकर्षण 105 फीट ऊंचा रोबोटिक रावण रहा। इसकी गर्दन 360 डिग्री तक घूमने और तलवार चलाने की तकनीक ने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी। वहीं, गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण की पारंपरिक शाही सवारी निकाली गई, जो दशहरा मैदान पहुंची। धार्मिक आस्था, राजसी परंपरा और आधुनिक तकनीक के मेल ने कोटा के दशहरा उत्सव को खास बना दिया।
105 फीट के रोबोटिक रावण में क्या है खास?
कोटा के दशहरा मेले में हर साल विशाल रावण के पुतले का दहन आकर्षण का केंद्र रहता है। लेकिन 2026 में पुतले को विशेष तकनीक के साथ तैयार किया गया। इसकी ऊंचाई 105 फीट रखी गई और इसे रोबोटिक विशेषताओं से लैस किया गया।
इस रावण की गर्दन 360 डिग्री घूम सकती है। इसके अलावा, पुतले की आंखें झपकाने और तलवार लहराने जैसी गतिविधियां भी इसकी खासियत बताई गईं। इन विशेषताओं ने इसे सामान्य पुतलों से अलग पहचान दी।
इस तरह की तकनीक के इस्तेमाल का उद्देश्य दर्शकों को एक अलग अनुभव देना और दशहरे के पारंपरिक आयोजन को नए अंदाज में प्रस्तुत करना है। विशाल पुतले के साथ होने वाला दहन मेले के सबसे प्रतीक्षित क्षणों में शामिल रहा।
गढ़ पैलेस से निकली भगवान लक्ष्मीनारायण की शाही सवारी
कोटा दशहरा मेले की पहचान केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। यहां भगवान लक्ष्मीनारायण की शोभायात्रा भी धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 20 अक्टूबर को शाम 5 बजे गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण की शोभायात्रा निकाली गई। पारंपरिक धार्मिक वातावरण और लोक संस्कृति की झलक के बीच यह सवारी दशहरा मैदान पहुंची।
इस आयोजन में कोटा की ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व है। शोभायात्रा दशहरा महोत्सव की उन परंपराओं में शामिल है, जो कई पीढ़ियों से शहर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती रही हैं।

रात 8 बजे निर्धारित था रावण दहन
मेले की आधिकारिक कार्यक्रम सूची के अनुसार, 20 अक्टूबर को रात 8 बजे दशहरा मैदान में विशाल रावण दहन निर्धारित किया गया था। इस आयोजन के लिए बड़ी संख्या में दर्शकों के पहुंचने की संभावना थी।
रावण दहन का धार्मिक संदेश बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय से जुड़ा है। भगवान श्रीराम की विजय की स्मृति में मनाया जाने वाला यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग परंपराओं के साथ आयोजित होता है।
कोटा में विशाल पुतले और आधुनिक तकनीक इस परंपरा को एक अलग रूप देते हैं। हालांकि, आयोजन का समय निर्धारित होने और वास्तविक दहन होने में अंतर हो सकता है। इसलिए कार्यक्रम की रिपोर्टिंग में निर्धारित समय और वास्तविक घटना के समय को अलग-अलग समझना जरूरी है।
133वें दशहरा मेले में परंपरा और आधुनिकता का संगम
कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला राजस्थान के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। यहां धार्मिक कार्यक्रमों के साथ रामलीला, लोक प्रस्तुतियां और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं।
इस साल 11 अक्टूबर से शुरू हुए मेले में 20 अक्टूबर को विजयादशमी का मुख्य आयोजन निर्धारित था। मेले का कार्यक्रम नवंबर की शुरुआत तक चलने की योजना के साथ तैयार किया गया है। इसके दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, मनोरंजन और पारंपरिक गतिविधियां आयोजित की जानी हैं।
रोबोटिक रावण जैसी तकनीकी विशेषताएं मेले में आधुनिकता का पहलू जोड़ती हैं, जबकि लक्ष्मीनारायण की शोभायात्रा धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखती है। यही मिश्रण कोटा के दशहरा उत्सव को अन्य आयोजनों से अलग बनाता है।
दर्शकों के लिए क्यों खास रहा यह आयोजन?
विशालकाय रावण, घूमती गर्दन और तलवार चलाने की तकनीक बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए उत्सुकता का विषय बनी। वहीं, धार्मिक शोभायात्रा ने श्रद्धालुओं को पारंपरिक उत्सव से जुड़ने का अवसर दिया।
ऐसे बड़े आयोजनों में भीड़ को देखते हुए दर्शकों के लिए सुरक्षा निर्देशों का पालन करना जरूरी है। बच्चों को साथ रखने, निर्धारित रास्तों का इस्तेमाल करने और आयोजन स्थल पर तैनात कर्मचारियों के निर्देश मानने से असुविधा से बचा जा सकता है।
निष्कर्ष
कोटा दशहरा 2026 में 105 फीट ऊंचे रोबोटिक रावण ने आधुनिक तकनीक के जरिए उत्सव को खास पहचान दी। 360 डिग्री घूमने वाली गर्दन और तलवार चलाने की विशेषता इसके प्रमुख आकर्षणों में शामिल रही। दूसरी ओर, गढ़ पैलेस से निकली भगवान लक्ष्मीनारायण की शाही सवारी ने धार्मिक और ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाया। इस तरह कोटा का 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला आस्था, विरासत और तकनीक के अनूठे संगम के रूप में सामने आया।

