20 मार्च 2026: को दिए गए एक बयान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गंगा प्रदूषण और धार्मिक भावनाओं के मुद्दे पर तीखा व्यंग्य किया, जिसने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। उनका यह बयान न केवल धार्मिक संवेदनाओं को लेकर था, बल्कि समाज की प्राथमिकताओं और पर्यावरण के प्रति उदासीनता पर भी सवाल खड़े करता है।
शंकराचार्य ने कहा कि “जब इसी गंगा नदी में 16 नालों से मल-मूत्र और गंदा पानी गिरता है, तब किसी की भावनाएं आहत नहीं होतीं, लेकिन इफ्तार पार्टी जैसे मुद्दों पर लोग तुरंत प्रतिक्रिया देने लगते हैं।” उनके इस बयान ने यह संकेत दिया कि समाज में असली समस्याओं की तुलना में प्रतीकात्मक मुद्दों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।

गंगा प्रदूषण: एक पुराना लेकिन गंभीर संकट
भारत की सबसे पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी दशकों से प्रदूषण की मार झेल रही है। औद्योगिक कचरा, सीवेज और नालों का गंदा पानी लगातार इसमें गिरता है। सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई गईं, जिनमें नमामि गंगे योजना प्रमुख है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
शंकराचार्य का कहना है कि गंगा की सफाई केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को इसके प्रति संवेदनशील होना होगा। उन्होंने धार्मिक संगठनों और आम जनता से भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।
धार्मिक भावनाएं बनाम पर्यावरण
अपने बयान में उन्होंने यह भी इशारा किया कि समाज में धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कई बार राजनीतिक और सामाजिक एजेंडे के लिए किया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पर्यावरण और धर्म दोनों से जुड़ा मुद्दा—जैसे गंगा की पवित्रता—खतरे में है, तो उस पर उतनी प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती?
यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में कई जगह धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर बहस जारी है। शंकराचार्य के अनुसार, “धर्म का असली अर्थ प्रकृति और जीवन की रक्षा है, न कि केवल प्रतीकात्मक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देना।”
बयान पर प्रतिक्रियाएं
शंकराचार्य के इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे सच्चाई का आईना बताया, जबकि कुछ ने इसे विवादास्पद और भड़काऊ करार दिया।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस बयान का समर्थन करते हुए कहा कि गंगा प्रदूषण वास्तव में एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। वहीं, कुछ धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने इस बयान को लेकर आपत्ति जताई और इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया।

समाज के लिए संदेश
इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण संदेश यह निकलकर सामने आता है कि समाज को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और जीवन का आधार है। यदि इसकी स्वच्छता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
शंकराचार्य का यह बयान भले ही विवादों में घिर गया हो, लेकिन इसने एक जरूरी बहस को जन्म दिया है—क्या हम सच में अपनी आस्था के मूल तत्वों की रक्षा कर रहे हैं या केवल दिखावे तक सीमित रह गए हैं?
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निष्कर्ष:
गंगा प्रदूषण और धार्मिक भावनाओं को लेकर दिया गया यह बयान समाज के सामने एक आईना रखता है। यह समय है कि हम वास्तविक मुद्दों—जैसे पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करें और आस्था को केवल प्रतीकों तक सीमित न रखें।

