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Home - राज्य - मंदिरों में प्रसाद में शराब पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: सरकार बोली- कोर्ट परंपराओं में दखल नहीं दे सकता

मंदिरों में प्रसाद में शराब पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: सरकार बोली- कोर्ट परंपराओं में दखल नहीं दे सकता

Rajat Kumar
Last updated: 2026/04/09 at 5:38 PM
Rajat Kumar
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5 Min Read
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धार्मिक परंपराओं: और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण तर्क पेश किया, जिसने बहस को नया आयाम दे दिया है।

Contents
परंपरा बनाम व्यक्तिगत अधिकारसबरीमाला केस का व्यापक संदर्भ50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाईजजों की टिप्पणियांसंवैधानिक बहस का केंद्रआगे क्या होगानिष्कर्ष

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत में कहा कि भारत के कई मंदिरों में प्रसाद के रूप में मदिरा (शराब) भी दी जाती है। ऐसे में अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि इन धार्मिक परंपराओं को रोका जाए। उनका कहना था कि धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर होना चाहिए।

परंपरा बनाम व्यक्तिगत अधिकार

सरकार ने अपने तर्क में यह भी कहा कि किसी विशेष धार्मिक परंपरा को मानने वाले समुदाय के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। यदि किसी मंदिर में शाकाहारी प्रसाद देने की परंपरा है, तो कोई व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि उसे वहां मांसाहारी भोजन दिया जाए।

इसी तरह, यदि किसी मंदिर में विशेष प्रकार की पूजा-पद्धति या प्रसाद वितरण की परंपरा है, तो बाहरी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर उसमें बदलाव की मांग नहीं कर सकता। यह तर्क धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर आधारित है।

सबरीमाला केस का व्यापक संदर्भ

यह बहस सबरीमाला मंदिर से जुड़े उस मामले के संदर्भ में हो रही है, जिसमें महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद रहा है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था।

हालांकि इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस छिड़ गई और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं। अब यह मामला 9 जजों की संविधान पीठ के सामने है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन तय करने की कोशिश कर रही है।

50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों में प्रचलित परंपराओं की वैधता और उनकी संवैधानिक सीमाओं पर सवाल उठाए गए हैं।

कोर्ट यह भी तय करेगा कि क्या धार्मिक परंपराएं मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं या नहीं, और किन परिस्थितियों में अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।

जजों की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि यदि मंदिरों में प्रवेश को लेकर भेदभाव किया जाता है, तो इससे समाज में विभाजन बढ़ सकता है। उनका मानना है कि धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव समाज की एकता के लिए ठीक नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि जितने अधिक लोग विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत होगा। यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि अदालत धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक समरसता को भी महत्व दे रही है।

संवैधानिक बहस का केंद्र

इस पूरे मामले में संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, जो धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों की गारंटी देते हैं।

एक ओर जहां याचिकाकर्ता समानता और भेदभाव के खिलाफ तर्क दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर धार्मिक संस्थाएं अपनी परंपराओं और स्वायत्तता की रक्षा की बात कर रही हैं।

आगे क्या होगा

यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में धार्मिक प्रथाओं और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन तय करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला साबित हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भविष्य में कई अन्य धार्मिक मामलों के लिए भी मिसाल बनेगा, जहां परंपरा और संविधान के बीच टकराव देखने को मिलता है।


निष्कर्ष

सबरीमाला मामले की सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। केंद्र सरकार और अदालत के बीच चल रही यह बहस आने वाले समय में देश के धार्मिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित कर सकती है।

TAGGED: Constitution Bench, India News, Legal Debate, Religious Rights, Sabarimala Case, Supreme Court, Women Entry
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