देश: की राजनीति में एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित है, जो आने वाले वर्षों में संसद की तस्वीर पूरी तरह बदल सकता है। केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा है, जिसे 2029 के आम चुनाव से लागू करने की योजना है। इस प्रस्ताव के साथ ही 33% महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी भी की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, कुल 850 सीटों में से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की जाएंगी। इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू रहेगा, यानी 2029, 2034 और 2039 के लोकसभा चुनावों तक।
सरकार इस बदलाव को लागू करने के लिए संविधान संशोधन की प्रक्रिया अपना रही है। अनुच्छेद 368 के तहत संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। यानी दोनों सदनों में न केवल कुल सदस्यों का बहुमत बल्कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन जरूरी होगा।
मौजूदा स्थिति में लोकसभा की 543 सीटों में से 3 सीटें खाली हैं और प्रभावी संख्या 540 है। यदि सभी सांसद मतदान करते हैं, तो कम से कम 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा। फिलहाल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास लगभग 293 सांसद हैं, जबकि विपक्षी INDIA गठबंधन के पास 234 सांसद हैं। ऐसे में सरकार को अन्य दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटाना होगा।
इस प्रस्ताव के तहत एक और महत्वपूर्ण बदलाव जनसंख्या के आधार को लेकर है। सीटों के पुनर्वितरण के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही गई है। हालांकि यही मुद्दा अब विवाद का केंद्र बन गया है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका कहना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाने से दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
इसी तरह, राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने भी इस प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देना चाहती है, तो इसे मौजूदा 543 सीटों में भी लागू किया जा सकता है। सीटों की संख्या बढ़ाने का उद्देश्य राजनीतिक लाभ उठाना हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण को एक साथ जोड़ने से राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। कई एक्टिविस्ट्स ने मांग की है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग किया जाए और मौजूदा सीटों पर ही लागू किया जाए।
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो उत्तर भारत के कई राज्यों में सीटों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 तक हो सकती हैं। महाराष्ट्र में 48 से बढ़कर 72 और बिहार में 40 से बढ़कर 60 सीटें होने का अनुमान है।
इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन की बहस तेज हो गई है। दक्षिणी राज्यों का मानना है कि इससे उनकी राजनीतिक शक्ति कमजोर हो सकती है।
निष्कर्ष:
लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने और महिला आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव भारत की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है। हालांकि, इसके साथ जुड़े परिसीमन और क्षेत्रीय असंतुलन के मुद्दे ने इसे विवादास्पद बना दिया है। आने वाले समय में संसद में इस पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।

