पश्चिम बंगाल: की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए राज्य सरकार ने सभी मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य कर दिया है। अब राज्य के सरकारी, सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त सभी मदरसों में कक्षाएं शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ गाया जाएगा। इस फैसले के बाद बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और इसे लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों तथा सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।
अल्पसंख्यक कार्य और मदरसा शिक्षा विभाग की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल राज्य के अंतर्गत आने वाले सभी मदरसों में पुराने नियमों को बदलते हुए यह नया निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू किया जाता है। आदेश के अनुसार सरकारी मॉडल मदरसे, सहायता प्राप्त मदरसे, मंजूर MSKS, मंजूर SSKS और गैर सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त मदरसों में अब प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य होगा।
मदरसा शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी अधिसूचना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी संस्था प्रमुखों और मदरसा प्रशासकों को इस आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। सरकार ने कहा है कि यह कदम राष्ट्रभक्ति और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
दरअसल, इससे पहले 14 मई 2026 को पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में भी ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य किया था। स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी आदेश में कहा गया था कि प्रत्येक स्कूल में कक्षाएं शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगीत गाया जाएगा। अब उसी नीति को मदरसों तक विस्तारित कर दिया गया है।
सरकार के इस फैसले को बीजेपी की राष्ट्रवादी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार लगातार शिक्षा संस्थानों में राष्ट्रवाद और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने की बात कहती रही है। सरकार का दावा है कि ‘वंदे मातरम्’ किसी धर्म विशेष का नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है और इसे लेकर किसी तरह का विवाद नहीं होना चाहिए।

हालांकि विपक्षी दलों और कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि मदरसों की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं होती हैं, ऐसे में सरकार को किसी विशेष गीत को अनिवार्य बनाने से पहले सभी पक्षों से चर्चा करनी चाहिए थी। कुछ संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से भी जोड़कर देखा है।
दूसरी ओर बीजेपी नेताओं का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रहा है और इसे गाने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पार्टी नेताओं का दावा है कि यह कदम युवाओं में देशभक्ति की भावना को मजबूत करेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में अगले चुनावों से पहले इस तरह के फैसले बीजेपी के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा माने जा सकते हैं। राज्य में पहले भी राष्ट्रगान, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और धार्मिक मुद्दों को लेकर कई बार राजनीतिक बहस हो चुकी है। अब मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य किए जाने के बाद यह मुद्दा और गरमा सकता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस फैसले को संवेदनशील तरीके से लागू किया जाए तो इससे विवाद कम हो सकते हैं। लेकिन यदि इसे राजनीतिक रंग दिया गया, तो सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी।
इस बीच सरकार ने साफ किया है कि आदेश का पालन नहीं करने वाले संस्थानों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जा सकती है। सभी जिला शिक्षा अधिकारियों और मदरसा बोर्ड अधिकारियों को भी इस संबंध में दिशा-निर्देश भेज दिए गए हैं।
बंगाल में मदरसों की संख्या काफी अधिक है और लाखों छात्र इनमें पढ़ाई करते हैं। ऐसे में यह फैसला शिक्षा और राजनीति दोनों स्तरों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और अधिक बहस देखने को मिल सकती है।
निष्कर्ष:
पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने का फैसला राज्य की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। जहां सरकार इसे राष्ट्रभक्ति से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष और कुछ संगठनों ने इसे संवेदनशील मुद्दा बताया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि इस आदेश का जमीनी स्तर पर कितना असर पड़ता है।

