उत्तर प्रदेश: विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अभी से तेज होती दिखाई दे रही हैं। राज्य की राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने चुनावी रणभूमि में उतरने का संकेत दे दिया है। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी 14 जून को बहराइच में एक बड़ी जनसभा को संबोधित करेंगे, जिसे उत्तर प्रदेश में AIMIM के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है।
ओवैसी का यह दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। खास बात यह है कि जनसभा से पहले वह सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर भी जाएंगे, जिससे राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह के संदेश देने की कोशिश दिखाई दे रही है।
मटेरा विधानसभा क्षेत्र से चुनावी शंखनाद
AIMIM प्रमुख की जनसभा बहराइच जिले के मटेरा विधानसभा क्षेत्र में शंकरपुर चौराहे के पास आयोजित की जाएगी। वर्तमान में यह सीट समाजवादी पार्टी की विधायक मारिया शाह के पास है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बहराइच और आसपास के जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रभाव होने के कारण AIMIM यहां अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी की नजर केवल एक-दो सीटों पर नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल और तराई क्षेत्र के कई विधानसभा क्षेत्रों पर है।
200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी
AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि पार्टी किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनती है तो वह उत्तर प्रदेश की लगभग 200 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है।
उन्होंने कहा कि पार्टी राज्यभर में संगठन विस्तार पर काम कर रही है और युवाओं, अल्पसंख्यकों तथा वंचित वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उनका दावा है कि AIMIM अब केवल मुस्लिम राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी के मुद्दों पर भी चुनाव लड़ेगी।
यदि पार्टी वास्तव में 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारती है, तो यह यूपी के चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

BSP के साथ गठबंधन की अटकलें तेज
सबसे अधिक चर्चा AIMIM और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संभावित गठबंधन को लेकर हो रही है। शौकत अली ने कहा कि यदि गठबंधन की स्थिति बनती है तो उनका “स्वाभाविक सहयोगी” BSP हो सकती है।
उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम और दलित वोट मिलकर राज्य में लगभग 40 प्रतिशत वोट शेयर बनाते हैं। ऐसे में यह गठबंधन समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है।
हालांकि BSP की ओर से अभी तक इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।
पिछला रिकॉर्ड क्यों बना चुनौती?
AIMIM के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसका पिछला चुनावी प्रदर्शन है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 96 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई।
इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन विधानसभा में खाता नहीं खोल पाई थी।
हालांकि स्थानीय निकाय चुनावों में AIMIM को कुछ क्षेत्रों में अच्छा समर्थन मिला था, लेकिन वह उसे विधानसभा चुनाव में वोटों में तब्दील नहीं कर सकी।
यही कारण है कि इस बार पार्टी संगठनात्मक मजबूती और बड़े सामाजिक समीकरणों पर काम करती दिखाई दे रही है।
मुस्लिम-दलित समीकरण पर फोकस
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि AIMIM की रणनीति मुस्लिम-दलित गठजोड़ के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की है।
राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 19 प्रतिशत और दलित आबादी लगभग 21 प्रतिशत मानी जाती है। यदि इन दोनों वर्गों का बड़ा हिस्सा किसी साझा राजनीतिक मंच पर आता है, तो यह कई सीटों पर चुनावी परिणाम प्रभावित कर सकता है।
इसी वजह से ओवैसी लगातार सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को अपने भाषणों में प्रमुखता दे रहे हैं।
बहराइच से क्यों शुरू हो रहा अभियान?
बहराइच लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहां मुस्लिम आबादी के साथ-साथ पिछड़े और दलित समुदायों की भी बड़ी संख्या है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बहराइच से अभियान शुरू करना AIMIM की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इससे पार्टी पूर्वांचल, अवध और तराई बेल्ट में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करेगी।
अब सभी की नजर 14 जून की जनसभा पर टिकी हुई है, जहां से ओवैसी 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपने राजनीतिक संदेश को धार देंगे।
निष्कर्ष:
उत्तर प्रदेश की राजनीति में AIMIM एक बार फिर सक्रिय भूमिका निभाने की तैयारी में है। बहराइच से शुरू होने वाला असदुद्दीन ओवैसी का अभियान केवल चुनावी रैली नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक ताकत दिखाने का प्रयास माना जा रहा है। यदि BSP के साथ गठबंधन की संभावनाएं आगे बढ़ती हैं, तो राज्य की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं।

