उम्र 60 साल, लेकिन अदालत ने कहा- अब आप ‘लेडी डॉन’ बन चुकी हैं
भारत: की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसे मामले में सख्त रुख अपनाया है, जिसने कानून और न्याय व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मध्य प्रदेश की एक 60 वर्षीय महिला, जो मादक पदार्थों से जुड़े मामले में पिछले एक साल से अधिक समय से जेल में बंद है, उसे सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। अदालत ने न केवल उसकी जमानत याचिका खारिज की, बल्कि सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणी भी की जिसने पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया।
सुप्रीम Court की पीठ ने महिला के आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए कहा कि वह पहली बार अपराध में शामिल नहीं हुई है और अब वह “लेडी डॉन” बन चुकी है। अदालत ने साफ संकेत दिया कि केवल उम्र, बीमारी या लंबी हिरासत किसी आरोपी को जमानत दिलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकते।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के धनपुरी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। यहां NDPS Act (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act) की धारा 8 और 20 के तहत एक मामला दर्ज किया गया था। जांच के दौरान पुलिस ने महिला को गिरफ्तार किया और 28 मई 2025 से वह न्यायिक हिरासत में है।
महिला पर आरोप है कि वह अवैध मादक पदार्थों के कारोबार से जुड़ी हुई थी। गिरफ्तारी के बाद उसने कई बार जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसे राहत नहीं मिली।
यह उसकी चौथी नियमित जमानत याचिका थी। इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भी उसकी याचिका खारिज कर चुका था। हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद महिला ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की। महिला के वकील ने अदालत के सामने कई तर्क रखे।
उन्होंने कहा कि:
- महिला की उम्र 60 वर्ष है।
- उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती।
- उसके पास से बरामद पदार्थ की मात्रा व्यावसायिक श्रेणी (Commercial Quantity) से कम है।
- उसे झूठा फंसाया गया है।
- मामले का ट्रायल बहुत धीमी गति से चल रहा है।
लेकिन अदालत इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई।

अदालत ने क्यों नहीं दी जमानत?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिला के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड पर विशेष ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ पहले भी इसी प्रकार के मामले दर्ज हो चुके हैं।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“आपकी उम्र हो चुकी है। आपको ऐसे कार्यों से दूर रहना चाहिए था। लेकिन रिकॉर्ड बताता है कि आप बार-बार इसी तरह के मामलों में शामिल रही हैं।”
जब महिला के वकील ने उम्र और स्वास्थ्य को आधार बनाकर राहत की मांग की, तब अदालत ने कहा कि केवल इन कारणों से जमानत नहीं दी जा सकती।
पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि महिला ने एक महिला होने के नाते जो भरोसा समाज में होना चाहिए था, उसे खो दिया है और अब वह “लेडी डॉन” की तरह दिखाई देती है।
NDPS मामलों में अदालतें क्यों रहती हैं सख्त?
भारत में NDPS कानून को सबसे कठोर आपराधिक कानूनों में गिना जाता है। इसका उद्देश्य नशे के कारोबार पर रोक लगाना और समाज को ड्रग्स के खतरे से बचाना है।
ऐसे मामलों में अदालतें जमानत देते समय निम्न बातों पर विशेष ध्यान देती हैं:
- आरोपी का आपराधिक इतिहास
- अपराध की गंभीरता
- समाज पर संभावित प्रभाव
- दोबारा अपराध करने की संभावना
- उपलब्ध साक्ष्य
यदि आरोपी के खिलाफ पहले से कई मामले दर्ज हों, तो अदालतें और अधिक सतर्क हो जाती हैं।
फैसले का व्यापक असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो बार-बार जमानत याचिकाएं दाखिल कर राहत पाने की कोशिश करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी आरोपी की उम्र, स्वास्थ्य या ट्रायल में देरी तभी मायने रखेगी जब उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक इतिहास न हो। यदि रिकॉर्ड में लगातार अपराध में शामिल होने के संकेत मिलते हैं, तो अदालतें राहत देने से बच सकती हैं।
यह फैसला कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए भी एक मजबूत संदेश माना जा रहा है कि NDPS जैसे गंभीर अपराधों में न्यायपालिका सख्त रुख बनाए हुए है।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून की नजर में अपराध की गंभीरता सबसे महत्वपूर्ण है। उम्र और बीमारी जैसे मानवीय पहलुओं पर विचार जरूर किया जाता है, लेकिन यदि आरोपी का आपराधिक इतिहास गंभीर हो और उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों, तो अदालत राहत देने से इनकार कर सकती है। 60 वर्षीय महिला की जमानत याचिका खारिज कर अदालत ने एक बार फिर दिखाया है कि NDPS मामलों में न्यायपालिका बेहद सतर्क और कठोर रुख अपनाती है।

