पटना: बिहार में बच्चों की गुमशुदगी अब केवल पुलिस रिकॉर्ड का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और मानवीय संकट का रूप ले चुकी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से लेकर बाल अधिकार संगठनों तक सभी इस बढ़ती समस्या को लेकर चिंता जता रहे हैं। वर्ष 2025 के आंकड़े राज्य की स्थिति को बेहद भयावह बनाते हैं। आंकड़ों के अनुसार बिहार में इस वर्ष कुल 14,699 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 6,927 बच्चों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लापता बच्चों में 85 प्रतिशत से अधिक लड़कियां हैं। यह आंकड़ा न केवल बाल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि मानव तस्करी, बाल विवाह और यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों की ओर भी संकेत देता है।
हर 36 मिनट में गायब हो रहा एक बच्चा
वर्ष 2025 के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो बिहार में हर महीने औसतन 1,225 बच्चे लापता हो रहे हैं। यह संख्या प्रतिदिन लगभग 40 बच्चों तक पहुंचती है। यानी हर घंटे लगभग दो बच्चे और हर 36 मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। बच्चों की गुमशुदगी का यह आंकड़ा किसी भी राज्य के लिए बेहद चिंताजनक माना जाता है।
13 वर्षों से जारी है यह संकट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में वर्ष 2013 से लगातार हर साल हजारों बच्चों के लापता होने के मामले सामने आ रहे हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय में यह समस्या कम होने के बजाय लगातार बढ़ती गई है।
मार्च 2026 में NHRC ने बिहार समेत पांच राज्यों से इस मुद्दे पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने विशेष रूप से मानव तस्करी के नेटवर्क और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर चिंता जताई है।
बेटियां सबसे ज्यादा निशाने पर
2025 के आंकड़ों के अनुसार कुल 14,699 लापता बच्चों में 12,526 लड़कियां और 2,173 लड़के शामिल हैं। यानी कुल मामलों में लड़कियों की हिस्सेदारी 85.2 प्रतिशत है।
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि लड़कियों की गुमशुदगी के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें बाल विवाह, जबरन विवाह, घरेलू काम के लिए तस्करी, यौन शोषण और प्रेम प्रसंग प्रमुख हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कई मामलों में किशोरियों को नौकरी या शादी का झांसा देकर दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है और फिर उन्हें शोषण के जाल में फंसा दिया जाता है।

दो वर्षों में 20 प्रतिशत बढ़े मामले
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में बिहार में 12,299 बच्चे लापता दर्ज किए गए थे। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 14,699 हो गई।
सिर्फ दो वर्षों में करीब 2,400 मामलों की वृद्धि दर्ज की गई है, जो लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाती है। यह संकेत देता है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे प्रयास पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं।
पटना बना तस्करों का बड़ा ट्रांजिट हब
राजधानी पटना रेल, सड़क और हवाई संपर्क का प्रमुख केंद्र होने के कारण मानव तस्करों के लिए ट्रांजिट हब बनता जा रहा है। पुलिस और बाल संरक्षण संगठनों के अनुसार पटना जंक्शन, राजेंद्र नगर टर्मिनल, दानापुर, फुलवारीशरीफ, कंकड़बाग और पटना सिटी जैसे इलाके संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हैं।
इन स्थानों से बच्चों को दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और नेपाल सीमा तक पहुंचाने के कई मामले सामने आ चुके हैं।
क्या कर रही है सरकार?
बिहार पुलिस के अनुसार यदि कोई बच्चा चार महीने तक नहीं मिलता है तो मामला स्वतः एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) को सौंप दिया जाता है। राज्य में 44 एएचटीयू, विशेष किशोर पुलिस इकाइयां और मिशन वात्सल्य पोर्टल जैसी व्यवस्थाएं सक्रिय हैं।
इसके अलावा रेलवे सुरक्षा बल की ‘ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते’ मुहिम के तहत हजारों बच्चों को बचाया भी गया है। बावजूद इसके लापता बच्चों की संख्या लगातार बढ़ना चिंता का विषय बना हुआ है।
निष्कर्ष
बिहार में बच्चों की गुमशुदगी केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि सामाजिक चेतावनी है। हर 36 मिनट में एक बच्चे का लापता होना यह बताता है कि बाल सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है। सरकार, पुलिस, सामाजिक संगठनों और परिवारों को मिलकर इस संकट से निपटने के लिए व्यापक और प्रभावी कदम उठाने होंगे। वरना हजारों परिवार अपने बच्चों की वापसी का इंतजार करते रह जाएंगे।

