नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा उस समय विवादों में घिर गई, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की एक अप्रकाशित आत्मकथा के अंश पढ़ने की कोशिश की। स्पीकर ने इसकी अनुमति नहीं दी, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा हंगामा शुरू हो गया और सदन की कार्यवाही तक बाधित करनी पड़ी।
इस विवाद के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि जनरल नरवणे कौन हैं, उनकी किताब अब तक क्यों प्रकाशित नहीं हुई और सेना के अधिकारियों को किताब छापने के लिए किन नियमों से गुजरना पड़ता है।
कौन हैं जनरल मनोज मुकुंद नरवणे
जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय थलसेना के 27वें सेना प्रमुख रह चुके हैं। उन्होंने 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक यह अहम पद संभाला।
वे उस समय सेना प्रमुख थे जब:
- वर्ष 2020 में गलवान घाटी संघर्ष हुआ
- पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव चरम पर था
- भारतीय सेना ने उत्तरी सीमाओं पर रणनीतिक पुनर्गठन किया
इसके अलावा जनरल नरवणे ने:
- डोकलाम गतिरोध (2017)
- कश्मीर और पूर्वोत्तर में कई अहम सैन्य अभियानों
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चार दशकों की सैन्य सेवा
जनरल नरवणे ने लगभग 40 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा दी। उनकी सेवानिवृत्ति के समय सरकार की ओर से जारी आधिकारिक नोट में कहा गया था कि उन्हें:
- कोविड-19 महामारी के दौरान सैनिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा
- पूर्वी लद्दाख में उत्तरी शत्रु को सख्त जवाब
- आत्मनिर्भर भारत के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण
- भविष्य के युद्धों के लिए नई और उभरती तकनीकों को अपनाने
के लिए याद किया जाएगा।
क्यों नहीं प्रकाशित हो पाई नरवणे की आत्मकथा
सूत्रों के अनुसार, जनरल नरवणे ने अपनी आत्मकथा लिखी है, लेकिन यह किताब पिछले तीन वर्षों से रक्षा मंत्रालय में प्रकाशन की अनुमति के लिए लंबित है।
भारतीय सेना से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों की किताबों में अक्सर:
- राष्ट्रीय सुरक्षा
- सैन्य रणनीति
- सीमा विवाद
- गोपनीय अभियानों
से जुड़ी जानकारियां होती हैं, इसलिए इनका प्रकाशन सीधे नहीं किया जा सकता।

सैन्य अफसरों की किताबों के प्रकाशन के नियम
भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय के नियमों के तहत:
- कोई भी सेवारत या सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी
- अपनी आत्मकथा या सैन्य विषय पर किताब प्रकाशित करने से पहले
- रक्षा मंत्रालय और संबंधित सैन्य मुख्यालय से अनुमति लेना अनिवार्य होता है
किताब की पांडुलिपि की जांच की जाती है ताकि:
- गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक न हों
- राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान न पहुंचे
- विदेश नीति या सैन्य रणनीति पर अनधिकृत खुलासे न हों
जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, किताब प्रकाशित नहीं की जा सकती।
संसद में क्यों हुआ विवाद
लोकसभा में राहुल गांधी ने जब जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने शुरू किए, तो सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई।
सरकार का तर्क था कि:
- किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है
- ऐसे में उसके अंशों को सदन में पढ़ना संसदीय नियमों के खिलाफ है
स्पीकर ने भी राहुल गांधी को इसकी अनुमति नहीं दी, जिसके बाद सदन में जोरदार हंगामा देखने को मिला।
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निष्कर्ष:
जनरल एमएम नरवणे की आत्मकथा को लेकर उठा विवाद केवल एक किताब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य गोपनीयता और संसदीय मर्यादाओं से जुड़ा मामला बन गया है। जहां विपक्ष इसे पारदर्शिता से जोड़कर देख रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि बिना अनुमति किसी अप्रकाशित सैन्य दस्तावेज का उल्लेख करना नियमों के खिलाफ है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।

