चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में एक नया विवाद तेजी से तूल पकड़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री थलपति सी. जोसेफ विजय की अध्यक्षता में होने वाली कैबिनेट और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी बैठकों में कथित तौर पर बाहरी लोगों की मौजूदगी को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। डीएमके ने इस पूरे मामले को सरकारी गोपनीयता और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ ऐसे लोग, जो न तो सरकारी अधिकारी हैं और न ही संवैधानिक पद पर हैं, उन्हें मुख्यमंत्री की उच्चस्तरीय बैठकों में शामिल होने की अनुमति दी जा रही है। विपक्ष का कहना है कि इससे सरकारी गोपनीयता पर खतरा पैदा हो सकता है और यह नियमों के उल्लंघन का मामला भी बन सकता है।
डीएमके ने DGP से की कार्रवाई की मांग
डीएमके के संगठन सचिव आर.एस. भारती ने 30 जून को डीजीपी को शिकायत सौंपते हुए जॉन अरोकिआसामी और विष्णु रेड्डी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। शिकायत के अनुसार, दोनों व्यक्तियों की मौजूदगी मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली कैबिनेट बैठकों, विभागीय समीक्षा बैठकों और अन्य संवेदनशील सरकारी चर्चाओं में देखी गई है।
डीएमके का आरोप है कि यदि किसी व्यक्ति के पास सरकारी अधिकार या आधिकारिक नियुक्ति नहीं है, तो उसका ऐसी बैठकों में शामिल होना प्रशासनिक नियमों और गोपनीयता संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन माना जा सकता है।
ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट का भी उठाया गया मुद्दा
शिकायत में यह भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के सदस्य गोपनीयता की शपथ लेते हैं। ऐसे में सरकारी दस्तावेजों, नीतियों और संवेदनशील फैसलों पर चर्चा के दौरान बाहरी व्यक्तियों की मौजूदगी Official Secrets Act और अन्य कानूनी प्रावधानों के खिलाफ हो सकती है।
विपक्ष का कहना है कि यदि इस प्रकार की बैठकों में अनधिकृत लोगों को प्रवेश दिया जाता है तो इससे शासन प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
कौन हैं जॉन अरोकिआसामी और विष्णु रेड्डी?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि विष्णु रेड्डी मुख्यमंत्री विजय के बेहद करीबी सहयोगी माने जाते हैं, जबकि जॉन अरोकिआसामी लंबे समय से राजनीतिक रणनीतिकार की भूमिका निभाते रहे हैं। बताया जाता है कि दोनों ने विजय की राजनीतिक यात्रा और टीवीके (Tamilaga Vettri Kazhagam) के संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि विपक्ष का सवाल यह है कि यदि दोनों केवल राजनीतिक सहयोगी हैं, तो उन्हें सरकारी बैठकों में शामिल होने की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
इस विवाद से पहले डीएमके सांसद पी. विल्सन ने भी सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में बाहरी लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि इन व्यक्तियों को मुख्यमंत्री कार्यालय परिसर में अलग चैंबर तक उपलब्ध कराए गए हैं और वे कई अहम बैठकों में मौजूद रहते हैं।
उन्होंने यह भी पूछा था कि यदि वे सरकारी अधिकारी नहीं हैं, तो उन्हें सरकारी गोपनीय दस्तावेजों और निर्णय प्रक्रिया तक पहुंच कैसे दी जा रही है।

टीवीके ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके ने विपक्ष के आरोपों को खारिज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि जिन लोगों का नाम लिया जा रहा है, उनकी भूमिका सरकार द्वारा अधिकृत है और वे प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ही बैठकों में शामिल होते हैं।
टीवीके नेताओं का दावा है कि सरकार ने आवश्यक आदेश जारी किए हैं और विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से उछाल रहा है।
फिल्म जगत से जुड़े लोगों की भूमिका पर भी चर्चा
रिपोर्टों के अनुसार, मुख्यमंत्री विजय के फिल्मी करियर से जुड़े कई पुराने सहयोगी भी अब प्रशासनिक और सलाहकार भूमिकाओं में दिखाई दे रहे हैं। इनमें फिल्म प्रबंधन, कैंपेन रणनीति, मीडिया समन्वय और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल बताए जा रहे हैं।
हाल ही में विजय के लंबे समय से सहयोगी जगदीश पलानीस्वामी द्वारा सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी सरकारी जिम्मेदारी का उल्लेख किए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि आखिर सरकार और राजनीतिक संगठन के बीच सीमाएं किस प्रकार तय की जा रही हैं।
राजनीतिक गलियारों में बढ़ी चर्चा
विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस मामले की आधिकारिक जांच होती है, तो इससे तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्ष इसे पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा बना रहा है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष इसे राजनीतिक आरोप बताकर खारिज कर रहा है।
अब सभी की नजर डीजीपी और राज्य सरकार की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है। यदि जांच आगे बढ़ती है तो कई प्रशासनिक और कानूनी पहलुओं की भी समीक्षा हो सकती है।
निष्कर्ष:
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति सी. जोसेफ विजय की सरकारी बैठकों में कथित तौर पर बाहरी लोगों की मौजूदगी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है। डीएमके ने डीजीपी से शिकायत कर एफआईआर की मांग की है, जबकि टीवीके ने सभी आरोपों को निराधार बताया है। यदि इस मामले की औपचारिक जांच होती है, तो इससे प्रशासनिक पारदर्शिता, सरकारी गोपनीयता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर नई बहस छिड़ सकती है।

