गोरखपुर: उत्तर प्रदेश का गोरखपुर शहर केवल गोरखनाथ मंदिर और धार्मिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक साहित्य प्रकाशन केंद्र गीता प्रेस के लिए भी जाना जाता है। करोड़ों लोगों के घरों तक श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथ पहुंचाने वाली इस संस्था की शुरुआत किसी बड़े उद्योगपति या सरकारी योजना से नहीं, बल्कि एक साधारण-सी घटना से हुई थी।
हाल ही में गीता प्रेस ने सोशल मीडिया पर अपने बारे में फैलाई जा रही अफवाहों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि संस्था पूरी क्षमता के साथ कार्य कर रही है। इसके बाद एक बार फिर गीता प्रेस के इतिहास और स्थापना की कहानी चर्चा में आ गई है।
एक ताने ने बदल दी इतिहास की दिशा
राजस्थान के चूरू में जन्मे सेठ जयदयाल गोयन्दका बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। किशोरावस्था में नाथ संप्रदाय के संत मंगलनाथ जी महाराज के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। कुछ समय व्यापार करने के बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय भगवद्गीता के प्रचार-प्रसार और सत्संग के लिए समर्पित कर दिया।
जब वे कोलकाता में सत्संग आयोजित करते थे, तब लोगों को अध्ययन के लिए शुद्ध और त्रुटिरहित श्रीमद्भगवद्गीता की आवश्यकता महसूस होने लगी। उस समय उपलब्ध अधिकांश प्रतियों में छपाई संबंधी गलतियां होती थीं।
इसी समस्या को दूर करने के लिए जयदयाल गोयन्दका ने कोलकाता के एक वणिक प्रेस से करीब 5,000 प्रतियां छपवाईं। सभी प्रतियां जल्दी समाप्त हो गईं, जिसके बाद दूसरा संस्करण 6,000 प्रतियों का प्रकाशित कराया गया।
लेकिन दूसरी बार भी प्रूफ की कई गलतियां सामने आईं। जयदयाल गोयन्दका बार-बार संशोधन कराने प्रेस पहुंचते रहे। आखिरकार प्रेस मालिक ने उनसे कहा—
“सेठजी, अगर इतनी शुद्ध गीता छपवानी है तो अपना प्रेस ही लगा लीजिए।”
यही एक वाक्य आगे चलकर इतिहास रचने वाला साबित हुआ।

गोरखपुर में रखी गई गीता प्रेस की नींव
जयदयाल गोयन्दका ने इस सुझाव को भगवान की प्रेरणा माना। उन्होंने अपने करीबी सहयोगियों हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी) और घनश्यामदास जालान से चर्चा की। दोनों ने गोरखपुर में प्रेस स्थापित करने का सुझाव दिया और इसकी जिम्मेदारी संभालने की बात कही।
साल 1923 में गोरखपुर में मात्र 10 रुपये मासिक किराए पर एक छोटा-सा मकान लिया गया। करीब 600 रुपये की लागत से एक हैंड प्रेस मशीन खरीदी गई और यहीं से गीता प्रेस की औपचारिक शुरुआत हुई।
शुरुआत भले ही छोटी थी, लेकिन उद्देश्य अत्यंत बड़ा था—देशभर के लोगों तक कम कीमत पर शुद्ध धार्मिक साहित्य उपलब्ध कराना।
धीरे-धीरे बना विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक प्रकाशन केंद्र
समय के साथ गीता प्रेस का दायरा लगातार बढ़ता गया। यहां से श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, उपनिषद, पुराण, धार्मिक पुस्तकें और बच्चों के लिए संस्कार आधारित साहित्य प्रकाशित होने लगा।
बाद में प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का प्रकाशन भी शुरू हुआ। प्रारंभिक अंकों की छपाई मुंबई में हुई, लेकिन कुछ समय बाद इसका पूरा प्रकाशन गोरखपुर से होने लगा।
आज ‘कल्याण’ भारत की सबसे लोकप्रिय धार्मिक पत्रिकाओं में गिनी जाती है।
90 करोड़ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित
गीता प्रेस का दावा है कि अब तक वह 90 करोड़ से अधिक धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित कर चुका है। इनमें लगभग 17 करोड़ प्रतियां केवल ‘कल्याण’ पत्रिका की हैं।
संस्था का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान को समाज के हर वर्ग तक सुलभ कराना रहा है। इसी कारण आज भी गीता प्रेस की अधिकांश पुस्तकें बेहद कम कीमत पर उपलब्ध कराई जाती हैं।
आज भी कायम है सेवा और संस्कार की परंपरा
लगभग एक सदी पुरानी यह संस्था आज भी आधुनिक तकनीक के साथ अपनी मूल भावना को बनाए हुए है। यहां प्रतिदिन हजारों धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित होकर देश और विदेश भेजी जाती हैं।
हाल ही में सोशल मीडिया पर संस्था को लेकर फैली अफवाहों के बाद गीता प्रेस ने स्पष्ट किया कि उसका प्रकाशन कार्य पूरी क्षमता के साथ जारी है और श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की भ्रमित करने वाली सूचनाओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
सनातन साहित्य का वैश्विक केंद्र
गीता प्रेस केवल एक प्रिंटिंग प्रेस नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और आध्यात्मिक साहित्य के संरक्षण का प्रतीक बन चुका है। करोड़ों परिवारों में धार्मिक ग्रंथों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में इस संस्था की भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है।
आज जब डिजिटल युग तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब भी गीता प्रेस की मुद्रित पुस्तकों की मांग लगातार बनी हुई है, जो इसकी विश्वसनीयता और सामाजिक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
निष्कर्ष:
गोरखपुर की गीता प्रेस की स्थापना किसी बड़े उद्योग या सरकारी सहायता से नहीं, बल्कि धार्मिक ग्रंथों की शुद्धता के प्रति एक संत के संकल्प से हुई थी। प्रेस मालिक की एक टिप्पणी—“अगर इतनी शुद्ध गीता चाहिए तो अपना प्रेस लगा लीजिए”—ने ऐसा इतिहास रचा, जिसने भारत ही नहीं बल्कि दुनिया को सबसे बड़ा धार्मिक साहित्य प्रकाशन केंद्र दिया। आज लगभग एक सदी बाद भी गीता प्रेस करोड़ों लोगों तक सनातन धर्म का संदेश पहुंचाने का कार्य निरंतर कर रही है।

