नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में एक बार फिर हालात तेजी से बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हुए संघर्ष विराम (सीजफायर) के बाद शांति की उम्मीद जगी थी, लेकिन एक महीने के भीतर ही दोनों देशों के बीच तनाव फिर चरम पर पहुंच गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल और गैस के टैंकरों को निशाना बनाए जाने, अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए बयान ने पूरे क्षेत्र को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान ने संघर्ष विराम की भावना का उल्लंघन किया है और अब अमेरिका इस समझौते को समाप्त मानता है। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि यदि ईरान की ओर से हमले जारी रहे तो अमेरिका और अधिक कड़ी सैन्य कार्रवाई करेगा।
कैसे बिगड़े हालात?
तनाव की शुरुआत तब हुई जब होर्मुज जलडमरूमध्य के पास कई वाणिज्यिक जहाजों और तेल टैंकरों पर हमले की खबरें सामने आईं। ईरान का आरोप था कि संबंधित जहाजों ने उसकी समुद्री चेतावनियों का पालन नहीं किया, जबकि अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का उल्लंघन बताते हुए जवाबी कार्रवाई की।
इसके बाद अमेरिकी सेंटकॉम ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए। रिपोर्टों के अनुसार, रडार सिस्टम, वायु रक्षा ठिकाने और सैन्य नौकाओं को निशाना बनाया गया। इस कार्रवाई के बाद ईरान ने भी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइल और ड्रोन दागे, जिससे तनाव और बढ़ गया।
ट्रंप ने क्यों कहा- अब नहीं होगी डील?
डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान कहा कि ईरान ने बार-बार समझौते का उल्लंघन किया है। उनके अनुसार, यदि ईरान हर हमले का जवाब हिंसा से देगा तो अमेरिका भी उससे अधिक ताकत के साथ जवाब देगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि अब ईरान के साथ किसी नए समझौते पर बातचीत करना समय की बर्बादी है।
अमेरिका ने इसी बीच ईरानी तेल निर्यात पर दी गई राहत भी वापस ले ली है, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

ईरान का पलटवार और आरोप
ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को संघर्ष विराम का उल्लंघन बताया है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका ने अपने वादों से पीछे हटकर क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाया है। साथ ही ईरान ने चेतावनी दी कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाई दोनों ही पहले हुए समझौते की भावना के खिलाफ हैं।
होर्मुज में क्यों बढ़ी चिंता?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और एलएनजी इसी रास्ते से गुजरता है। तनाव बढ़ने के बाद कई तेल टैंकरों ने अपना मार्ग बदल दिया है, जबकि कुछ जहाजों को वापस लौटना पड़ा।
संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समुद्री संस्था (IMO) ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। संस्था के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में हजारों नाविक अब भी जहाजों पर फंसे हुए हैं और लगातार सैन्य गतिविधियों के कारण उनकी सुरक्षा को लेकर जोखिम बना हुआ है।
भारत की क्या तैयारी है?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का सैन्य संकट भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकता है।
सूत्रों के अनुसार, भारत ने तेल आपूर्ति की स्थिति पर लगातार निगरानी शुरू कर दी है। जहाजों की आवाजाही, वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर भी संबंधित एजेंसियां सतर्क हैं। भारतीय जहाजों और समुद्री हितों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
दुनिया पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबा खिंचता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है। इसके साथ ही वैश्विक शेयर बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों में महंगाई और परिवहन लागत बढ़ने की आशंका है।
एशिया और यूरोप की कई अर्थव्यवस्थाएं भी इस संकट से प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि उनकी ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है।
निष्कर्ष:
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी घटनाक्रम पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। भारत भी स्थिति पर लगातार निगरानी रखते हुए अपनी ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने में जुटा है। आने वाले दिनों में दोनों देशों की अगली रणनीति वैश्विक हालात की दिशा तय कर सकती है।

