‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ कहना गलत, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी; 10 साल पुराने ट्रेन हादसे में परिवार को मिला न्याय
देश: की सर्वोच्च अदालत ने रेलवे यात्रियों के अधिकारों और दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ जैसी अभिव्यक्ति उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि ‘सेकेंड क्लास’ का संबंध केवल रेलवे कोच की श्रेणी से होना चाहिए, किसी यात्री की पहचान या दर्जे से नहीं।
इसी मामले में अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को पलटते हुए वर्ष 2015 में ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले यात्री के परिवार को ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि केवल टिकट बरामद न होने के आधार पर किसी मृतक को वैध यात्री (Bona Fide Passenger) मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।
10 साल पुराने हादसे में मिला परिवार को न्याय
यह मामला नवंबर 2015 का है। मध्य प्रदेश के रहने वाले चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान वह अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिर गए, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
दुर्घटना के बाद उनका बैग भी गायब हो गया। परिवार का कहना था कि उसी बैग में यात्रा का टिकट रखा हुआ था। चूंकि टिकट बरामद नहीं हुआ, इसलिए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उन्हें वैध यात्री मानने से इनकार कर दिया और मुआवजा देने की मांग खारिज कर दी।
अब लगभग 10 वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों फैसलों को पलटते हुए मृतक की पत्नी लता ठक्कर को ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है।
चार सप्ताह में भुगतान का आदेश
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार और रेलवे को निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि चार सप्ताह के भीतर जारी की जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि तय समय में भुगतान नहीं किया गया तो दावा दायर किए जाने की तारीख से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
‘सेकेंड क्लास’ शब्द पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे के नियमों और दस्तावेजों में प्रयुक्त ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर भी टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान या महत्व उसके टिकट की श्रेणी से तय नहीं किया जाना चाहिए। ‘सेकेंड क्लास’ केवल कोच की श्रेणी है, यात्री की नहीं। इसलिए भविष्य में ऐसी शब्दावली के उपयोग पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
टिकट नहीं मिलने का मतलब अवैध यात्री नहीं
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा कानून एक कल्याणकारी कानून है। ऐसे कानूनों की व्याख्या संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उदार तरीके से की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दुर्घटना के बाद टिकट बरामद नहीं होता, तो केवल इसी आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि मृतक वैध यात्री नहीं था।
यदि दावेदार शपथपत्र, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और अन्य उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अपना प्रारंभिक दावा प्रस्तुत करता है, तो उसके बाद उस दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की होगी।
रेलवे और यात्रियों दोनों की जिम्मेदारी
फैसले के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि ट्रेन दुर्घटनाओं के लिए पूरी जिम्मेदारी केवल रेलवे पर नहीं डाली जा सकती।
कोर्ट के अनुसार, यात्रियों को भी अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। चलती ट्रेन पकड़ना, दरवाजे पर खड़े होकर सफर करना या अनावश्यक जोखिम उठाना गंभीर हादसों का कारण बन सकता है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि कई बार यात्रियों को भीड़ और अन्य व्यावहारिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में रेलवे की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
रेलवे को दिए महत्वपूर्ण सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को भीड़भाड़ रोकने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई सुझाव दिए।
अदालत ने कहा कि—
- भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था और अधिक प्रभावी बनाई जाए।
- रेलवे में पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति की जाए।
- टिकट जांच और सुरक्षा निगरानी को मजबूत किया जाए।
- दुर्घटना की स्थिति में यात्रियों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जाए।
कोर्ट का मानना है कि पर्याप्त मानव संसाधन होने से न केवल यात्रियों की सुरक्षा बेहतर होगी बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
यात्रियों के अधिकारों पर अहम संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। इससे उन परिवारों को राहत मिल सकती है, जिनके पास दुर्घटना के बाद टिकट उपलब्ध नहीं रहता, लेकिन अन्य साक्ष्य मौजूद होते हैं।
साथ ही, अदालत की यह टिप्पणी कि यात्री की पहचान उसके टिकट की श्रेणी से नहीं की जानी चाहिए, समानता और सम्मान के सिद्धांत को भी मजबूत करती है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक परिवार को मुआवजा दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि रेलवे यात्रियों के अधिकारों और सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि टिकट का न मिलना किसी व्यक्ति को स्वतः अवैध यात्री नहीं बनाता और ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ जैसी शब्दावली पर भी पुनर्विचार की जरूरत है। साथ ही रेलवे और यात्रियों दोनों को सुरक्षा के प्रति अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाने की सलाह दी गई है।


