नई दिल्ली: पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण (E-20 Fuel) को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने संसद में बड़ा दावा किया है। सरकार का कहना है कि यदि देश में एथनॉल मिश्रण नीति लागू नहीं की गई होती, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता और पेट्रोल की कीमत 125 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक हो सकती थी। सरकार ने यह भी दावा किया कि कुछ परिस्थितियों में बिना एथनॉल वाले पेट्रोल की कीमत 169 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी।
संसद में दिए गए जवाब में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि एथनॉल मिश्रण नीति का उद्देश्य केवल पेट्रोल की कीमत नियंत्रित करना ही नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना भी है।
सरकार ने क्यों किया E-20 नीति का बचाव?
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, फरवरी 2026 में मिडिल ईस्ट में संघर्ष शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। ऐसी स्थिति में यदि भारत पूरी तरह आयातित पेट्रोलियम पर निर्भर रहता, तो पेट्रोल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिलता।
सरकार का दावा है कि पहले से तय कीमतों पर खरीदे गए घरेलू एथनॉल की वजह से उपभोक्ताओं को प्रति लीटर लगभग 30 रुपये तक की राहत मिली। यही कारण रहा कि देश में ईंधन की कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित रहीं।
E-20 पेट्रोल क्या है?
E-20 पेट्रोल का अर्थ है ऐसा ईंधन जिसमें 20 प्रतिशत एथनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिलाया जाता है।
एथनॉल मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। चूंकि इसका उत्पादन देश में ही होता है, इसलिए इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होती।
सरकार का मानना है कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और किसानों को भी अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है।

गरीबों का अनाज इस्तेमाल होने के आरोपों पर सरकार का जवाब
संसद में विपक्ष द्वारा यह सवाल उठाया गया कि क्या गरीबों के लिए निर्धारित खाद्यान्न या भारतीय खाद्य निगम (FCI) के सब्सिडी वाले चावल का उपयोग एथनॉल उत्पादन में किया जा रहा है?
इस पर पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं।
सरकार ने कहा कि एथनॉल उत्पादन के लिए गरीबों के राशन या सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अनाज को डायवर्ट नहीं किया जा रहा है।
अभी कितनी है पेट्रोल की कीमत?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मिडिल ईस्ट संकट के दौरान करीब 75 दिनों तक पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखी गईं। बाद में मई 2026 में कीमतों में लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई।
वर्तमान में दिल्ली में E-20 पेट्रोल की कीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर बताई गई है।
सरकार का दावा है कि यदि एथनॉल मिश्रण उपलब्ध नहीं होता, तो कीमतें काफी अधिक हो सकती थीं।
क्या E-20 से माइलेज कम होता है?
लोकसभा में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने स्वीकार किया कि E-10 ईंधन के लिए डिजाइन किए गए पुराने BS-III, BS-IV और BS-VI वाहनों में E-20 पेट्रोल इस्तेमाल करने पर माइलेज में लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
इससे पहले पेट्रोलियम मंत्रालय भी 3 से 5 प्रतिशत तक माइलेज कम होने की बात स्वीकार कर चुका है।
हालांकि सरकार का कहना है कि यह कमी सीमित है और इसके बदले मिलने वाले पर्यावरणीय तथा आर्थिक लाभ अधिक महत्वपूर्ण हैं।
वैज्ञानिक परीक्षण के बाद लागू हुई नीति
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने संसद में बताया कि E-20 पेट्रोल को लागू करने से पहले ऑटोमोबाइल कंपनियों, तेल कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों से व्यापक सलाह-मशविरा किया गया।
इंजन की क्षमता, पार्ट्स की अनुकूलता, उत्सर्जन मानकों और वाहन प्रदर्शन का परीक्षण करने के बाद ही इस नीति को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया।
सरकार का कहना है कि भविष्य में देश के अधिकांश नए वाहन E-20 ईंधन के अनुकूल होंगे।
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ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले एथनॉल का उपयोग बढ़ाने से विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय में वृद्धि और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूती मिल सकती है।
सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में वैकल्पिक ईंधन को और अधिक बढ़ावा देना है ताकि पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता लगातार कम की जा सके।
निष्कर्ष:
संसद में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि E-20 एथनॉल मिश्रण नीति केवल पेट्रोल की कीमत नियंत्रित करने का माध्यम नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। हालांकि माइलेज में मामूली कमी की बात स्वीकार की गई है, लेकिन सरकार का दावा है कि कुल मिलाकर यह नीति देश और उपभोक्ताओं दोनों के लिए लाभकारी साबित हो रही है।

