प्रयागराज: में दर्ज एक संवेदनशील मामले ने धार्मिक, कानूनी और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर के बाद अब मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गया है। स्वामी ने गिरफ्तारी की आशंका के बीच अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए याचिका दाखिल की है। अब सबकी नजर हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी है—क्या उन्हें राहत मिलेगी या गिरफ्तारी की कार्रवाई आगे बढ़ेगी?
क्या है पूरा मामला?
21 फरवरी को प्रयागराज में पॉक्सो कोर्ट के आदेश पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। एफआईआर में आरोप है कि पिछले एक वर्ष के दौरान एक नाबालिग समेत दो व्यक्तियों का यौन उत्पीड़न किया गया।
यह मामला प्रयागराज की विशेष POCSO अदालत के निर्देश पर दर्ज हुआ। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि धार्मिक प्रभाव और गुरु-सेवा की आड़ में उत्पीड़न की घटनाएं हुईं। आरोपियों पर धार्मिक पहचान का दुरुपयोग कर विश्वास का उल्लंघन करने का भी आरोप है।

शिकायत किसने दर्ज कराई?
इस मामले में शिकायत स्वामी रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज और एक नाबालिग सहित अन्य व्यक्तियों की ओर से की गई। आरोपों के मुताबिक हाल ही में प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान पीड़ितों ने अपनी आपबीती साझा की थी।
शिकायत में कहा गया है कि 14 और 17 वर्ष के किशोरों के साथ अनुचित व्यवहार किया गया। कोर्ट ने शिकायत को गंभीर मानते हुए एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए।
पुलिस जांच कहां तक पहुंची?
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने दोनों कथित पीड़ितों के बयान दर्ज कर लिए हैं। बताया जा रहा है कि एक पीड़ित का मेडिकल परीक्षण कराया गया है, जबकि दूसरे का बोर्ड परीक्षा चलने के कारण अभी मेडिकल नहीं हो पाया है।
पुलिस का कहना है कि मामले में वैज्ञानिक साक्ष्य (Scientific Evidence) जुटाने की भी कोशिश की जा रही है। जांच एजेंसियां डिजिटल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल्स और अन्य संभावित साक्ष्यों की जांच कर रही हैं।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इन आरोपों को साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि उन्हें बदनाम करने के लिए षड्यंत्र रचा गया है। उन्होंने एक तस्वीर सार्वजनिक करते हुए दावा किया कि एक पुलिस अधिकारी और शिकायतकर्ता के बीच संबंध इस पूरे प्रकरण की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करती है तो वे विरोध नहीं करेंगे। हालांकि इसके बाद उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी है।
अग्रिम जमानत क्यों?
अग्रिम जमानत वह कानूनी राहत है, जिसके तहत आरोपी को गिरफ्तारी से पहले ही जमानत मिल सकती है। स्वामी ने अपनी याचिका में कहा है कि जांच या ट्रायल लंबित रहने तक उन्हें गिरफ्तारी से संरक्षण दिया जाए।
अब हाई कोर्ट इस पर विचार करेगा कि क्या आरोपों की प्रकृति, जांच की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन्हें राहत दी जा सकती है।

सियासत भी हुई तेज
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस ने खुलकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने वाराणसी में उनसे मुलाकात कर इसे “सनातन धर्म का अपमान” बताया।
कांग्रेस का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पार्टी ने प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखकर इस प्रकरण में पारदर्शी जांच की मांग की है।
दूसरी ओर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और जांच को प्रभावित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
कानूनी पेचिदगियां
POCSO एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत दर्ज मामलों को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें सख्त प्रावधान और त्वरित सुनवाई की व्यवस्था होती है।
यदि आरोप साबित होते हैं तो सजा कठोर हो सकती है। वहीं, यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो आरोपी को राहत मिल सकती है। इसलिए अदालत का निर्णय महत्वपूर्ण होगा।
बनारस की माटी, आशीर्वाद की शक्ति।
आज उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री @kashikirai जी ने वाराणसी स्थित ज्योतिर्विद्यामठ पहुँचकर पूज्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
धर्म जब सत्य के साथ खड़ा होता है, तो विजय… pic.twitter.com/eeX5mcfmQl
— UP Congress (@INCUttarPradesh) February 24, 2026
क्या हो सकता है आगे?
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हाई कोर्ट अग्रिम जमानत मंजूर कर सकती है।
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याचिका खारिज होने पर गिरफ्तारी की संभावना बढ़ सकती है।
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अदालत शर्तों के साथ अंतरिम राहत दे सकती है।
इस बीच पुलिस जांच जारी रहेगी। मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक साक्ष्य और गवाहों के बयान मामले की दिशा तय करेंगे।
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सामाजिक और धार्मिक प्रभाव
यह मामला धार्मिक संस्थानों की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर भी बहस छेड़ रहा है। समर्थकों का कहना है कि यह संत समाज को बदनाम करने की साजिश है, जबकि आलोचकों का कहना है कि कानून से ऊपर कोई नहीं।

