नई दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियों के सामने पाकिस्तान से जुड़े कथित जासूसी नेटवर्क के तौर-तरीकों में बदलाव का एक नया पैटर्न सामने आने का दावा किया गया है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, संवेदनशील सैन्य इलाकों के आसपास ऐसे कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिन्हें सोलर पैनल या सिम-आधारित कनेक्शन के जरिए संचालित किया जा सकता है। आरोप है कि इन कैमरों से मिलने वाली तस्वीरें या लाइव फीड दूर बैठे हैंडलर्स तक पहुंचाई जा रही थीं।
इस तरह के मामलों ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता इसलिए बढ़ाई है क्योंकि किसी सैन्य क्षेत्र के आसपास लगाया गया कैमरा केवल सामान्य निगरानी उपकरण नहीं रह जाता। अगर उसका इस्तेमाल सैन्य वाहनों की आवाजाही, सुरक्षा व्यवस्था या किसी संवेदनशील गतिविधि पर नजर रखने के लिए किया जाए, तो उससे रणनीतिक जानकारी हासिल की जा सकती है।
लुधियाना में सामने आया कैमरा नेटवर्क
29 अगस्त को लुधियाना में सामने आए एक मामले ने इस कथित नेटवर्क की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। पुलिस के मुताबिक, रिछपाल सिंह ने बद्दोवाल छावनी के पास अपनी दुकान के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे। आरोप है कि कैमरों का रुख ऐसे रास्ते की ओर था, जहां सैन्य वाहनों की आवाजाही होती थी।
पुलिस का दावा है कि कैमरों की लॉगिन जानकारी पाकिस्तानी हैंडलर्स के साथ साझा की गई थी और वे मोबाइल एप के माध्यम से कैमरों की लाइव फीड देख सकते थे। जांच में यह भी सामने आने की बात कही गई कि आरोपी को दुकान के किराये के लिए नियमित भुगतान किया जाता था और अलग-अलग किश्तों में रकम भी दी गई।
अगर जांच में ये आरोप पुष्ट होते हैं, तो यह पारंपरिक जासूसी के बजाय स्थानीय स्तर पर तकनीकी निगरानी उपकरणों के इस्तेमाल की ओर इशारा करेगा।
सोलर कैमरों ने बढ़ाई सुरक्षा एजेंसियों की चिंता
सुरक्षा एजेंसियों के लिए सोलर कैमरों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन्हें उन जगहों पर भी लगाया जा सकता है जहां सामान्य बिजली कनेक्शन उपलब्ध नहीं है। ऐसे कैमरों में मोबाइल नेटवर्क आधारित कनेक्टिविटी होने पर दूर से निगरानी की संभावना बनी रहती है।
इसी वजह से सैन्य प्रतिष्ठानों और संवेदनशील इलाकों के आसपास लगे संदिग्ध कैमरों की जांच को सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है।

मार्च से अगस्त तक सामने आए कई मामले
दिए गए विवरण के अनुसार, इस तरह की गतिविधियों से जुड़े कई मामले अलग-अलग महीनों में सामने आने का दावा किया गया है।
मार्च 2026 में एनआईए की जांच में सोनीपत और दिल्ली छावनी रेलवे स्टेशनों के आसपास सोलर-चालित कैमरों के इस्तेमाल का मामला सामने आया और कई लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई।
अप्रैल में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के सैन्य इलाकों के आसपास कई कैमरों का पता लगाने की बात सामने आई। कपूरथला और जालंधर में भी सिम-आधारित कैमरों के इस्तेमाल की जांच का उल्लेख किया गया।
मई में पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास दुकान से सेना की गतिविधियों पर नजर रखने के आरोप में कार्रवाई की गई।
जून में बठिंडा में सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए लगाए गए एक सोलर कैमरे के बरामद होने की जानकारी सामने आई।
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर सुरक्षा एजेंसियां यह जांच कर रही हैं कि क्या इनके पीछे किसी बड़े नेटवर्क की भूमिका है या अलग-अलग घटनाओं को एक ही नेटवर्क से जोड़ना उचित नहीं होगा।
आतंकियों के डिजिटल संचार का तरीका भी बदला?
इसी बीच जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी नेटवर्क के संचार तरीकों को लेकर भी सुरक्षा एजेंसियों की ओर से चिंता जताई गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ आतंकी और उनके मददगार पारंपरिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जगह वैकल्पिक चैटिंग और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
बताया गया है कि कुछ मामलों में डेटिंग या एडल्ट वेबसाइटों के पीछे उपलब्ध चैट सुविधाओं और विशेष संचार एप्स का इस्तेमाल निर्देशों के आदान-प्रदान के लिए किए जाने की आशंका है।
सुरक्षा एजेंसियों की चिंता का एक कारण ऐसे प्लेटफॉर्म्स की पहचान और निगरानी से जुड़ी तकनीकी जटिलताएं हैं। कुछ सेवाएं अतिरिक्त प्राइवेसी फीचर्स, एन्क्रिप्शन और सीमित पहचान जानकारी के साथ काम करती हैं।
हालांकि, किसी विशेष प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को अपने आप आतंकी या जासूस साबित नहीं करता। किसी मामले में यह निष्कर्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने असली चुनौती क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक का गलत इस्तेमाल है। पहले जहां संवेदनशील स्थानों की जानकारी हासिल करने के लिए मानव नेटवर्क या प्रत्यक्ष निगरानी पर निर्भरता अधिक होती थी, वहीं अब सस्ते कैमरे, इंटरनेट कनेक्टिविटी और दूर से निगरानी करने वाली तकनीक ने खतरा बदल दिया है।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब केवल संदिग्ध लोगों की पहचान करना ही चुनौती नहीं है, बल्कि संवेदनशील इलाकों के आसपास मौजूद डिजिटल उपकरणों की निगरानी करना भी जरूरी हो गया है।
सैन्य क्षेत्रों के आसपास अनधिकृत कैमरों की पहचान, उनके मालिकों की जांच, डेटा कहां जा रहा है इसकी पड़ताल और संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों को जोड़ना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
जांच से सामने आएगा पूरा नेटवर्क
ऑपरेशन सिंदूर के बाद कथित तौर पर सामने आए इन मामलों ने जासूसी के बदलते तौर-तरीकों पर बहस तेज कर दी है। सोलर कैमरों से लेकर वैकल्पिक डिजिटल संचार तक, सुरक्षा एजेंसियों को अब जमीन और ऑनलाइन—दोनों स्तरों पर निगरानी मजबूत करनी पड़ रही है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या अलग-अलग राज्यों में सामने आए कैमरा मामलों के पीछे एक संगठित नेटवर्क है या ये अलग-अलग घटनाएं हैं। जांच एजेंसियों की पड़ताल और आरोपियों से पूछताछ के बाद ही इसकी पूरी तस्वीर साफ हो सकेगी।
निष्कर्ष
सैन्य इलाकों के आसपास कथित सोलर और सिम-आधारित कैमरों से निगरानी तथा वैकल्पिक ऑनलाइन संचार माध्यमों के इस्तेमाल के मामले सुरक्षा व्यवस्था के बदलते स्वरूप को दिखाते हैं। यदि जांच में पाकिस्तानी हैंडलर्स तक लाइव फीड पहुंचाने के आरोप पुष्ट होते हैं, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर मामला होगा। फिलहाल इन मामलों में सामने आए दावों की जांच जारी है और पूरे नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

