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Reading: सुप्रीम कोर्ट में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर सख्त टिप्पणी: सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना का बड़ा बयान
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Home - दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर सख्त टिप्पणी: सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना का बड़ा बयान

सुप्रीम कोर्ट में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर सख्त टिप्पणी: सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना का बड़ा बयान

Rajat Kumar
Last updated: 2026/04/23 at 2:37 PM
Rajat Kumar
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4 Min Read
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नई दिल्ली: में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को एक अहम और सख्त टिप्पणी सामने आई, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी। महिलाओं के प्रवेश से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई कर रही संविधान पीठ के सामने जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी अदालत में स्वीकार नहीं की जा सकती।”

Contents
महिलाओं की एंट्री पर गहराया संवैधानिक विवादधर्म बनाम समानता का टकरावसुनवाई का अब तक का क्रमतकनीक और सूचना पर कोर्ट की सख्तीनिष्कर्ष:

यह टिप्पणी उस समय आई जब दाउदी बोहरा समुदाय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल अपनी दलील रख रहे थे। उन्होंने कहा कि ज्ञान और जानकारी किसी भी स्रोत से आए, उसे पूरी तरह नकारा नहीं जाना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने एक अखबार में प्रकाशित कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor के लेख का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम बरतने की बात कही गई थी।

इस पर अदालत ने साफ किया कि व्यक्तिगत लेख या राय न्यायिक प्रक्रिया का आधार नहीं बन सकते। मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant ने कहा कि “हम प्रतिष्ठित व्यक्तियों का सम्मान करते हैं, लेकिन उनकी निजी राय अदालत के निर्णय का आधार नहीं हो सकती।”

महिलाओं की एंट्री पर गहराया संवैधानिक विवाद

Sabarimala Temple में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश को लेकर यह मामला वर्षों से विवाद का विषय बना हुआ है। इस पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। यह मामला केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें महिलाओं के अधिकार, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मुद्दे भी शामिल हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि यह तय करना बेहद कठिन है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “आवश्यक” (Essential) है और कौन-सी नहीं। कोर्ट ने कहा कि संविधान में “एसेन्शियल प्रैक्टिस” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, जिससे इस अवधारणा को लागू करना और जटिल हो जाता है।

धर्म बनाम समानता का टकराव

बहस के दौरान वरिष्ठ वकीलों ने अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि धार्मिक संप्रदायों को अपने नियम तय करने का अधिकार होना चाहिए। उनके अनुसार, पूजा की विधि, समय और तरीके तय करना श्रद्धालुओं और संप्रदाय का अधिकार है।

वहीं, वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं हो सकती। यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसे संवैधानिक मानकों के अधीन होती है। यानी, यदि कोई प्रथा इन मूल्यों के खिलाफ जाती है, तो उस पर सवाल उठाया जा सकता है।

जस्टिस नागरत्ना ने इस दौरान एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिरों को किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर मंदिर दूसरों के लिए बंद रहेंगे, तो इससे समाज में विभाजन बढ़ेगा और अंततः उसी संप्रदाय को नुकसान होगा।

सुनवाई का अब तक का क्रम

इस मामले की सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हुई थी और शुरुआती दिनों में केंद्र सरकार ने महिलाओं के प्रवेश के विरोध में अपनी दलीलें रखीं। सरकार का तर्क था कि देश में कई ऐसे मंदिर भी हैं जहां पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, अदालत में सात प्रमुख संवैधानिक सवालों पर बहस हो रही है, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या अदालत किसी धार्मिक प्रथा को “आवश्यक” घोषित कर सकती है या नहीं।

तकनीक और सूचना पर कोर्ट की सख्ती

जस्टिस नागरत्ना की “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” वाली टिप्पणी को व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। यह केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में तथ्यात्मक और प्रमाणिक जानकारी की आवश्यकता को रेखांकित करती है। डिजिटल युग में जहां सूचनाओं की भरमार है, वहीं अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि केवल विश्वसनीय और प्रमाणिक स्रोत ही स्वीकार्य होंगे।


निष्कर्ष:

सबरीमाला मामला अब केवल एक मंदिर में प्रवेश का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन का बड़ा परीक्षण बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां संकेत देती हैं कि अंतिम फैसला व्यापक संवैधानिक सिद्धांतों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

TAGGED: CJI Surya Kant, India Judiciary, Justice Nagaratna, Religious Freedom, Sabarimala Case, Supreme Court, Women Rights
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