जमीयत उलमा-ए-हिंद: के अध्यक्ष अरशद मदनी ने देश की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत को योजनाबद्ध तरीके से एक “वैचारिक राष्ट्र” में बदलने की कोशिश की जा रही है। मदनी ने कहा कि पहले केवल मुसलमानों को निशाना बनाया जाता था, लेकिन अब इस्लाम को भी सीधे तौर पर टारगेट किया जा रहा है।
अरशद मदनी ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जमीयत उलमा-ए-हिंद की कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक का घोषणापत्र जारी किया। इस दौरान उन्होंने देश में बढ़ती सांप्रदायिकता, धार्मिक ध्रुवीकरण और संवैधानिक संस्थाओं की कथित चुप्पी पर चिंता जताई।
‘मुसलमान न कभी झुका है और न झुकेगा’
मदनी ने अपने बयान में कहा कि मुसलमानों को डराकर और धमकाकर अपनी शर्तों पर जीवन जीने के लिए मजबूर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा—
“मुसलमान न कभी झुका है और न कभी झुकेगा। वह प्रेम से झुक सकता है, लेकिन ताकत, धमकी और अत्याचार के सामने उसे कभी झुकाया नहीं जा सकता।”
उन्होंने आरोप लगाया कि देश में नफरत की राजनीति अब धमकी की राजनीति में बदल चुकी है। सत्ता हासिल करने के लिए धार्मिक उन्माद और विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि कानून व्यवस्था संभालने वाली संस्थाएं मूकदर्शक बनी हुई हैं।
‘देश को वैचारिक राष्ट्र बनाने की कोशिश’
अरशद मदनी ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC), वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने की मांग, मस्जिदों और मदरसों के खिलाफ कार्रवाई और नागरिकता से जुड़े मुद्दों को एक विशेष एजेंडे के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ये सभी कदम इस बात का संकेत हैं कि देश को संविधान आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था से हटाकर एक वैचारिक राष्ट्र में बदलने की कोशिश हो रही है।
मदनी ने साफ कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद इन सभी मुद्दों पर कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई जारी रखेगी।

शुभेंदु अधिकारी के बयान पर भी हमला
अपने बयान में मदनी ने पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी के उस कथित बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे “सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करेंगे।”
मदनी ने इसे संविधान और लोकतंत्र की भावना के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि कोई भी मुख्यमंत्री पूरे राज्य के नागरिकों के लिए शपथ लेता है, न कि किसी एक समुदाय के लिए।
उन्होंने कहा—
“सरकारें न्याय और इंसाफ से चलती हैं, भय और धमकी से नहीं।”
‘2014 के बाद हालात ज्यादा गंभीर’
अरशद मदनी ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में भी मुसलमानों को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा, लेकिन 2014 के बाद हालात ज्यादा गंभीर हो गए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में बनाए गए कई कानून और सरकारी फैसले मुसलमानों और इस्लाम दोनों को प्रभावित करने वाले रहे हैं। मदनी ने कहा कि अब स्थिति सिर्फ राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रही, बल्कि धार्मिक पहचान को भी निशाना बनाया जा रहा है।
भाईचारे और संविधान बचाने की अपील
अपने पोस्ट के अंत में अरशद मदनी ने सभी लोकतांत्रिक दलों, सामाजिक संगठनों और देशहित में सोचने वाले नागरिकों से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश में भाईचारा, सहिष्णुता और संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए संयुक्त संघर्ष जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों का मुकाबला लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से किया जाना चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल
अरशद मदनी के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर भी उनके बयान को लेकर बहस छिड़ गई है। एक तरफ उनके समर्थक इसे मुसलमानों की आवाज बता रहे हैं, तो दूसरी ओर विरोधी इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ाने वाला बयान कह रहे हैं।
हालांकि, जमीयत उलमा-ए-हिंद का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल संविधान और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना है।
निष्कर्ष:
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों पर लगातार बहस जारी है। मदनी ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए मुसलमानों और इस्लाम को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया है। उनके बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्मा दिया है।

