राजगीर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में बिहार स्थित नालंदा विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक ‘शास्त्रार्थ’ पहल की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तेजी से बदलते दौर में भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ने का जो प्रयास नालंदा विश्वविद्यालय कर रहा है, वह देश के भविष्य के लिए प्रेरणादायक है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उतना ही जरूरी है कि समाज अपनी बौद्धिक, सांस्कृतिक और नैतिक जड़ों से जुड़ा रहे। ऐसे समय में नालंदा विश्वविद्यालय का शास्त्रार्थ मॉडल नई पीढ़ी को संवाद, तर्क और विचार-विमर्श की संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
AI युग में भारतीय ज्ञान परंपरा की नई पहचान
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि मानव की रचनात्मकता, चिंतन और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहे।
उन्होंने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय हजारों वर्ष पुरानी भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत कर रहा है। यह केवल इतिहास को जीवित रखने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य को नई दिशा देने की पहल भी है।
क्या है ‘शास्त्रार्थ’ परंपरा?
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने बताया कि शास्त्रार्थ केवल बहस या तर्क-वितर्क नहीं है, बल्कि यह विचारों के आदान-प्रदान की अनुशासित प्रक्रिया है। इसमें तथ्य, तर्क और धैर्य के साथ अपनी बात रखना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना दूसरों के विचारों को सम्मानपूर्वक सुनना।
उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में शास्त्रार्थ की परंपरा सदियों तक ज्ञान, दर्शन और शोध का आधार रही है। इसी परंपरा को नालंदा विश्वविद्यालय ने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने का सफल प्रयास किया है।

दीक्षांत समारोह का बना विशेष आकर्षण
प्रधानमंत्री मोदी ने खुशी जताई कि नालंदा विश्वविद्यालय ने अपने दीक्षांत समारोह में शास्त्रार्थ को महत्वपूर्ण स्थान दिया।
विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी, सतत विकास, विज्ञान, तकनीक और अन्य समकालीन विषयों पर कुल 25 से अधिक विषयों में विचार-विमर्श आयोजित किया गया। इन चर्चाओं में 200 से अधिक विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
सबसे खास बात यह रही कि इनमें लगभग आधे प्रतिभागी विभिन्न देशों से आए विदेशी छात्र थे। इससे नालंदा विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय पहचान और वैश्विक शैक्षणिक महत्व का भी पता चलता है।
अन्य विश्वविद्यालयों से भी की अपील
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय का यह प्रयोग देश के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
उन्होंने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों से आग्रह किया कि वे भी भारतीय ज्ञान परंपरा, संवाद संस्कृति और शास्त्रार्थ जैसी बौद्धिक परंपराओं को अपने पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गतिविधियों का हिस्सा बनाने पर विचार करें।
प्रधानमंत्री का मानना है कि इससे छात्रों में तार्किक सोच, सहिष्णुता, संवाद क्षमता और आलोचनात्मक चिंतन का विकास होगा।
कुलपति ने जताया आभार
प्रधानमंत्री की सराहना के बाद नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने उनका आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन विश्वविद्यालय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके निरंतर सहयोग से नालंदा विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।
कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय बौद्धिक विरासत को आधुनिक वैश्विक विमर्श से जोड़ने के लिए लगातार कार्य कर रहा है। शास्त्रार्थ जैसी परंपराएं छात्रों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि बेहतर संवाद और नेतृत्व क्षमता भी प्रदान करती हैं।
भारत की शिक्षा प्रणाली को मिलेगा नया आयाम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश के अन्य विश्वविद्यालय भी इस मॉडल को अपनाते हैं तो भारतीय शिक्षा प्रणाली केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शोध, विचार और नवाचार को भी नई गति मिलेगी।
शास्त्रार्थ जैसी परंपराएं छात्रों को अलग-अलग विचारों को समझने, तार्किक तरीके से अपनी बात रखने और लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति विकसित करने में मदद कर सकती हैं।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में नालंदा विश्वविद्यालय की ‘शास्त्रार्थ’ पहल की सराहना केवल एक विश्वविद्यालय की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश है। AI और आधुनिक तकनीक के दौर में भारतीय बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने का यह प्रयास देश की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। यदि अन्य विश्वविद्यालय भी इस पहल को अपनाते हैं, तो भारत की शिक्षा प्रणाली संवाद, शोध और नवाचार के नए युग में प्रवेश कर सकती है।

