नई दिल्ली। देश में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है। दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को दायर एक जनहित याचिका (PIL) में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच पर प्रतिबंध लगाने और किशोरों के लिए सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने हेतु देशव्यापी कानूनी ढांचा तैयार करने की मांग की गई है। याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर ‘नाइट कर्फ्यू’ जैसी व्यवस्था लागू की जाए, ताकि रात के समय उनके डिजिटल उपयोग को सीमित किया जा सके।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुई। हालांकि न्यायमूर्ति करिया ने स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 5 अगस्त को नई खंडपीठ के समक्ष होगी।
क्या है पूरी याचिका?
यह याचिका तीन वर्ष की बच्ची की मां कीर्ति दुआ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की आसान पहुंच उनके मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।
याचिका में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के साथ-साथ Meta, Google (YouTube), Telegram, Snapchat और X जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी पक्षकार बनाया गया है।

क्यों उठी सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की मांग?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया पर अश्लील, हिंसक और अनुचित सामग्री के संपर्क में आसानी से आ जाते हैं। इसके अलावा अत्यधिक स्क्रीन टाइम, गेमिंग और सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई, व्यवहार और सामाजिक जीवन पर गंभीर असर डाल रही है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि डिजिटल लत अब केवल एक पारिवारिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और बाल संरक्षण का विषय बन चुकी है। इसलिए केवल प्लेटफॉर्म्स की स्वैच्छिक नीतियों पर निर्भर रहने के बजाय एक मजबूत और बाध्यकारी कानूनी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
याचिका में क्या-क्या मांगें की गई हैं?
याचिका में सरकार से कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की मांग की गई है। इनमें प्रमुख रूप से—
- 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पूर्ण प्रतिबंध।
- 13 से 16 वर्ष तक के किशोरों के लिए आयु के अनुरूप कंटेंट नियंत्रण।
- रात्रि के समय सोशल मीडिया उपयोग पर ‘नाइट कर्फ्यू’ लागू करना।
- डिजियात्रा जैसी अनिवार्य आयु सत्यापन प्रणाली विकसित करना।
- आईटी अधिनियम, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और पॉक्सो अधिनियम का सख्ती से पालन कराना।
- बाल यौन शोषण सामग्री वाले URL को तुरंत ब्लॉक करने और संवेदनशील कंटेंट फ़िल्टरिंग को अनिवार्य बनाना।
मौलिक अधिकारों का भी दिया गया हवाला
याचिका में कहा गया है कि बच्चों को अनुचित डिजिटल सामग्री से सुरक्षित रखना संविधान के तहत राज्य की जिम्मेदारी है। इसमें अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 39(एफ) (बच्चों की सुरक्षा और विकास) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सरकार की जिम्मेदारी है कि बच्चों को शोषण और हानिकारक परिस्थितियों से बचाया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का हवाला देते हुए दावा किया है कि युवाओं और किशोरों में डिजिटल लत, चिंता, अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में वृद्धि देखी जा रही है।
क्या भारत में बदल सकते हैं सोशल मीडिया के नियम?
यदि अदालत इस मामले में सरकार से जवाब मांगती है या दिशा-निर्देश जारी करती है, तो भविष्य में भारत में बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग को लेकर नए नियम बन सकते हैं। हालांकि फिलहाल यह केवल एक जनहित याचिका है और अदालत ने इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना सरकार और अदालत दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

5 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले को नई खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। अब 5 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर सभी की निगाहें रहेंगी। इसी दौरान अदालत यह तय करेगी कि याचिका पर आगे किस प्रकार की कार्यवाही की जाए और संबंधित मंत्रालयों तथा सोशल मीडिया कंपनियों से जवाब तलब किया जाए या नहीं।
फिलहाल यह मामला देश में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, डिजिटल अनुशासन और सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग को लेकर नई बहस का कारण बन गया है।
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निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट में दायर यह जनहित याचिका बच्चों की डिजिटल सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठाती है। हालांकि अभी इस पर कोई न्यायिक निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन 5 अगस्त की सुनवाई इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। यदि भविष्य में इस संबंध में कोई कानूनी ढांचा तैयार होता है, तो भारत में बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया उपयोग के नियमों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

