नई दिल्ली: आवारा पशुओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, समाज के दोहरे रवैये पर उठाए सवाल
देशभर: में आवारा पशुओं की वजह से होने वाले सड़क हादसों और बढ़ती समस्याओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब तक पशु आर्थिक रूप से उपयोगी रहते हैं, तब तक उनकी देखभाल की जाती है, लेकिन जैसे ही उनकी उपयोगिता खत्म होती है, उन्हें सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति उन्हीं पशुओं का इस्तेमाल अपने परिवार का पेट भरने के लिए करता है तो समाज इसका विरोध करने लगता है। अदालत ने इस स्थिति को समाज का विरोधाभासी व्यवहार बताया।
सड़कों पर पशुओं को छोड़ना गंभीर समस्या
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी पशु को पालता है तो उसकी पूरी जिंदगी उसकी देखभाल करना भी उसकी जिम्मेदारी है। केवल उपयोग खत्म होने पर उसे सड़क पर छोड़ देना न तो नैतिक है और न ही कानूनी दृष्टि से उचित माना जा सकता है।
पीठ ने कहा कि वास्तविकता यह है कि कई पशुपालक या डेयरी संचालक आर्थिक कठिनाइयों के कारण ऐसा करते हैं, लेकिन इसका समाधान पशुओं को आवारा छोड़ देना नहीं हो सकता।
‘पेट भरने के लिए इस्तेमाल करे तो बुरा लगता है’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समाज के दोहरे मानदंडों पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि एक ओर लोग पशुओं को बिना सुरक्षा और देखभाल के खुले में छोड़ देते हैं, वहीं दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति भोजन के लिए उनका उपयोग करता है तो समाज इसे गलत मानता है।
अदालत की यह टिप्पणी पशु संरक्षण, सामाजिक सोच और जिम्मेदारी पर व्यापक बहस को जन्म देने वाली मानी जा रही है।
शेल्टर होम तक पहुंचाना मालिक की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर समझना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि यदि कोई पशुपालक किसी कारणवश अपने पशु की देखभाल नहीं कर सकता, तो उसे सड़क पर छोड़ने के बजाय अधिकृत गौशाला या पशु शेल्टर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं बल्कि पशु मालिकों की भी है।
24 राज्यों में कानून, फिर भी समस्या बरकरार
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि देश के 24 राज्यों में मवेशियों की हत्या रोकने के लिए कानून मौजूद हैं। बावजूद इसके पशुओं की सुरक्षा, देखभाल और पुनर्वास से जुड़े प्रावधानों का प्रभावी तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा कि वे आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान निकालें ताकि सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सके और पशुओं की भी सुरक्षा सुनिश्चित हो।

2007 के हादसे से जुड़ा था मामला
यह पूरा मामला पंजाब के संगरूर जिले में वर्ष 2007 में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा था। एक आवारा सांड के हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। मृतक की पत्नी ने न्यायालय में मुआवजे की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पीड़ित महिला के पक्ष में फैसला सुनाया और उसे 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर आवारा पशुओं की मौजूदगी प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी तय करती है।
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सरकारों को ठोस नीति बनाने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में आवारा पशुओं की समस्या लगातार बढ़ रही है। इससे हर साल हजारों सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, किसानों की फसलें भी प्रभावित होती हैं और पशुओं का जीवन भी खतरे में रहता है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पशु संरक्षण, सड़क सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी को लेकर एक व्यापक संदेश देती है। यदि सरकारें, स्थानीय निकाय और पशुपालक मिलकर प्रभावी व्यवस्था तैयार करें तो इस गंभीर समस्या का समाधान संभव है।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने आवारा पशुओं की समस्या पर समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि पशुओं को उपयोग खत्म होने पर सड़क पर छोड़ना स्वीकार्य नहीं है। साथ ही सरकारों से स्थायी समाधान तैयार करने और पशु मालिकों से जिम्मेदारी निभाने की अपील की है।

