बेंगलुरु/चेन्नई: दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच दशकों पुराना कावेरी जल विवाद एक बार फिर चर्चा में है। इस बार विवाद इसलिए तेज हो गया है क्योंकि तमिलनाडु सरकार ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों का पालन नहीं होने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी की है। दूसरी ओर, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने राज्य की रणनीति तय करने और राजनीतिक सहमति बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई।
बैठक में कांग्रेस, भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। माना जा रहा है कि इस बैठक का उद्देश्य कावेरी जल बंटवारे के मुद्दे पर राज्य का साझा रुख तय करना और आगे की कानूनी एवं प्रशासनिक रणनीति तैयार करना था।
क्यों बुलाई गई सर्वदलीय बैठक?
हाल के दिनों में तमिलनाडु सरकार ने आरोप लगाया है कि कर्नाटक, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के निर्देशों के अनुसार पानी नहीं छोड़ रहा है। राज्य सरकार का कहना है कि इससे तमिलनाडु के किसानों को नुकसान हो रहा है।
तमिलनाडु के कानून मंत्री ने कहा है कि राज्य अपने हिस्से का पानी सुनिश्चित कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेगा। उनका कहना है कि अदालत से प्राधिकरण के आदेशों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग की जाएगी।
इसी घटनाक्रम के बीच कर्नाटक सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर राज्य के हितों की रक्षा के लिए आगे की रणनीति पर चर्चा की।
कर्नाटक में विरोध क्यों बढ़ा?
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा कर्नाटक से निर्धारित अवधि तक प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने के निर्देश के बाद राज्य में किसान संगठनों और कई कन्नड़ संगठनों ने विरोध दर्ज कराया।
उनका तर्क है कि कर्नाटक स्वयं कम वर्षा और जल संकट की स्थिति का सामना कर रहा है। ऐसे में अतिरिक्त पानी छोड़ने से राज्य के किसानों और पेयजल व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
इसी विवाद के चलते राज्य में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है और कई सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं।

क्या है कावेरी नदी?
कावेरी दक्षिण भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। इसका उद्गम कर्नाटक के कोडागु जिले में स्थित तलाकावेरी से होता है। इसके बाद यह कर्नाटक, तमिलनाडु और पुडुचेरी से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
कावेरी बेसिन लाखों किसानों की सिंचाई, पेयजल और उद्योगों की जरूरतों को पूरा करता है। यही कारण है कि इसके जल बंटवारे का मुद्दा दोनों राज्यों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
कावेरी जल विवाद नया नहीं है। इसकी जड़ें ब्रिटिश काल तक जाती हैं।
- 1892 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच पहला समझौता हुआ।
- 1924 में दूसरा समझौता हुआ, जिसकी अवधि 50 वर्ष मानी गई।
- समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद जल बंटवारे को लेकर विवाद और गहरा गया।
लगातार बढ़ते मतभेदों के बाद वर्ष 1990 में केंद्र सरकार ने कावेरी जल विवाद अधिकरण (CWDT) का गठन किया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या कहता है?
कई वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
अदालत ने कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह एक जल वर्ष (जून से मई) के दौरान निर्धारित मात्रा के अनुसार तमिलनाडु के लिए 177 टीएमसी पानी उपलब्ध कराए।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जल बंटवारे की निगरानी और विवादों के समाधान के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल नियामक समिति (CWRC) का गठन किया जाए।
फिर भी विवाद क्यों खत्म नहीं हुआ?
हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू है, लेकिन हर वर्ष मानसून, जलाशयों में पानी की उपलब्धता और कृषि आवश्यकताओं को लेकर दोनों राज्यों के बीच मतभेद उभर आते हैं।
कम वर्षा वाले वर्षों में कर्नाटक का कहना होता है कि पहले राज्य की पेयजल और कृषि जरूरतें पूरी की जाएं, जबकि तमिलनाडु का तर्क रहता है कि उसे अदालत और प्राधिकरण द्वारा तय हिस्से का पानी समय पर मिलना चाहिए।
यही कारण है कि लगभग हर वर्ष मानसून के दौरान यह विवाद फिर चर्चा में आ जाता है।
आगे क्या हो सकता है?
तमिलनाडु के सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी और कर्नाटक की सर्वदलीय बैठक के बाद यह मामला फिर न्यायिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर सक्रिय हो सकता है।
यदि अदालत में नई याचिका दाखिल होती है, तो दोनों राज्यों को अपने-अपने पक्ष और जल उपलब्धता के आंकड़े पेश करने होंगे। साथ ही केंद्र सरकार और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।
निष्कर्ष
कावेरी जल विवाद केवल पानी के बंटवारे का मामला नहीं, बल्कि लाखों किसानों, पेयजल आपूर्ति और दो राज्यों के आर्थिक हितों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के बावजूद विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अब तमिलनाडु की संभावित कानूनी कार्रवाई और कर्नाटक की रणनीति पर पूरे देश की नजर रहेगी।

