नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार का दिन श्रम कानून से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले के लिए अहम है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ‘इंडस्ट्री’ यानी उद्योग की कानूनी परिभाषा को लेकर अपना फैसला सुनाने वाली है। यह मामला केवल एक कानूनी शब्द की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, सरकारी कल्याणकारी विभागों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों से जुड़े अधिकारों पर पड़ सकता है।
नौ जजों की पीठ ने 19 मार्च को मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब पूरे देश की नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट करीब पांच दशक पुरानी कानूनी व्याख्या को बरकरार रखता है या उसमें कोई बड़ा बदलाव करता है।
1978 के फैसले से शुरू हुआ था विवाद
इस मामले की जड़ बंगलूरू जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड बनाम राजप्पा मामले में 1978 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक जाती है।
उस समय सात जजों की पीठ ने ‘उद्योग’ शब्द की अपेक्षाकृत व्यापक व्याख्या की थी। इस व्याख्या के कारण कई ऐसी संस्थाएं भी औद्योगिक विवाद कानून के दायरे में आ गईं, जिन्हें सामान्य तौर पर पारंपरिक अर्थ में उद्योग नहीं माना जाता था।
अस्पताल, शिक्षण संस्थान, क्लब और सरकारी कल्याणकारी गतिविधियों से जुड़े कई संस्थानों के कर्मचारियों को इस फैसले के बाद श्रम कानूनों के तहत संरक्षण मिलने का रास्ता खुला।
अब सवाल यह है कि क्या उस समय की गई इतनी व्यापक व्याख्या आज भी कानूनी रूप से सही है?
नौ जजों की पीठ के सामने सबसे बड़ा सवाल
संविधान पीठ को यह तय करना है कि 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर द्वारा बताए गए परीक्षण के आधार पर किसी संस्था या उपक्रम को ‘उद्योग’ माना जाना सही कानूनी स्थिति है या नहीं।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘उद्योग’ की परिभाषा तय होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किसी संस्था में काम करने वाले कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद कानून के तहत किस स्तर तक संरक्षण मिल सकता है।
यानी अदालत का फैसला केवल कानून की किताब में एक परिभाषा तय नहीं करेगा, बल्कि कई संस्थानों और उनके कर्मचारियों के बीच श्रम संबंधों पर भी असर डाल सकता है।

सरकारी विभाग और कल्याणकारी योजनाएं भी दायरे में
मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल सरकारी विभागों और उनके द्वारा संचालित सामाजिक कल्याणकारी गतिविधियों से जुड़ा है।
अदालत को यह देखना है कि क्या सरकार की ओर से संचालित सामाजिक कल्याण के काम, योजनाएं और दूसरे उपक्रम भी ‘औद्योगिक गतिविधि’ की श्रेणी में आ सकते हैं।
अगर किसी गतिविधि को उद्योग के दायरे में माना जाता है, तो उससे जुड़े कर्मचारियों के श्रम अधिकारों और विवादों के समाधान के लिए उपलब्ध कानूनी रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं।
इसी वजह से इस फैसले को सरकारी संस्थानों और कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2020 की औद्योगिक संबंध संहिता का भी संदर्भ
संविधान पीठ के सामने एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 से जुड़ा है। यह कानून औद्योगिक विवाद अधिनियम समेत पुराने श्रम कानूनों की जगह लाने के उद्देश्य से बनाया गया था और दी गई जानकारी के अनुसार 21 नवंबर 2025 से प्रभावी हुआ।
अब अदालत को यह भी देखना है कि नई कानूनी व्यवस्था का 1978 में तय की गई ‘उद्योग’ की व्याख्या पर क्या प्रभाव पड़ता है।
हालांकि पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि उसका फैसला पुराने कानून के तहत लंबित और मौजूदा विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण होगा। इसलिए पुराने मामलों पर भी इस फैसले की नजर रहेगी।
अस्पताल और शिक्षण संस्थानों पर क्यों रहेगी नजर?
1978 के फैसले के बाद अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों जैसी संस्थाओं को लेकर कई कानूनी विवाद सामने आए। सवाल यह रहा कि क्या इन संस्थानों को केवल उनकी सेवा या सामाजिक प्रकृति के कारण उद्योग की श्रेणी से बाहर रखा जाए या वहां कर्मचारियों की ओर से किए जाने वाले काम और संस्था की गतिविधियों को भी ध्यान में रखा जाए।
अब नौ जजों की पीठ इस पूरे कानूनी ढांचे की दोबारा समीक्षा कर रही है।
अगर अदालत पुरानी व्यापक व्याख्या को कायम रखती है तो कई मामलों में मौजूदा कानूनी स्थिति जारी रह सकती है। वहीं अगर अदालत इसमें बदलाव करती है, तो पुराने और नए विवादों पर इसके प्रभाव को लेकर नए कानूनी सवाल खड़े हो सकते हैं।
आज के फैसले पर क्यों टिकी हैं नजरें?
इस मामले की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि फैसला संविधान पीठ की ओर से आएगा। नौ जजों की पीठ का निर्णय भविष्य में उद्योग और श्रम कानून से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सुप्रीम कोर्ट 1978 में तय की गई ‘उद्योग’ की व्यापक परिभाषा को बरकरार रखेगा या आज के बदलते कानूनी और आर्थिक माहौल के हिसाब से इसकी नई व्याख्या करेगा?
फैसले के बाद अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, सरकारी कल्याणकारी गतिविधियों और कर्मचारियों से जुड़े कई विवादों की कानूनी दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ का ‘उद्योग’ की परिभाषा पर फैसला श्रम कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 1978 के ऐतिहासिक फैसले ने इस शब्द का दायरा व्यापक किया था। अब शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि उस व्याख्या को कायम रखा जाए या उसमें बदलाव किया जाए। फैसले का प्रभाव कर्मचारियों, संस्थानों और पुराने श्रम विवादों पर पड़ सकता है।

