नई दिल्ली। नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने छात्रा की हिरासत को गैरकानूनी ठहराते हुए 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था और इस राशि की वसूली जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से करने को कहा था।
इस मामले में अब कानूनी लड़ाई का अगला चरण सुप्रीम कोर्ट में होगा। इससे पहले 9 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जाएगी। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भी अपील की बात सामने आई, जबकि डीएम मेधा रूपम ने अपने खिलाफ दिए गए व्यक्तिगत निर्देशों को चुनौती देने के लिए अलग याचिका दायर की है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के प्रदर्शन से जुड़ा है। आकृति चौधरी को इस प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत की कार्रवाई की। इसी मामले में सामाजिक कार्यकर्ता-पत्रकार सत्य वर्मा पर भी NSA लगाए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।
आकृति चौधरी ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया। सुनवाई के बाद अदालत ने 2 सितंबर को उनकी NSA हिरासत को रद्द कर दिया।
हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह मामला केवल एक हिरासत आदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और संवैधानिक अधिकारों को लेकर भी बड़ी बहस का विषय बन गया।
हाई कोर्ट ने हिरासत आदेश पर क्यों उठाए सवाल?
इलाहाबाद हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि हिरासत के आधार में पर्याप्त ठोस सामग्री नहीं थी और आदेश पारित करते समय आवश्यक स्तर पर तथ्यों की जांच नहीं की गई। अदालत ने इसे मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला माना। रिपोर्टों के मुताबिक, कोर्ट ने माना कि NSA जैसी कठोर preventive detention व्यवस्था का इस्तेमाल केवल अनुमान, पूर्वाग्रह या अस्पष्ट सामग्री के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना संवैधानिक संरक्षण के दायरे में आता है और केवल संभावित कानून-व्यवस्था की आशंका के आधार पर सार्वजनिक सभा या विरोध को रोकना उचित नहीं हो सकता।

5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश
हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यह राशि गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम और मामले में जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए, जिसमें शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने वाले संबंधित पुलिस अधिकारी तक शामिल थे।
इसके अलावा अदालत ने डीएम और मामले की फाइल तैयार करने में शामिल अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया था। इस आदेश ने प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर खासा ध्यान खींचा।
‘Orwellian Dystopia’ वाली टिप्पणी क्यों चर्चा में?
मामले की सबसे चर्चित टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट की ‘Orwellian Dystopia’ वाली चेतावनी रही।
अदालत ने कहा कि यदि नौकरशाही का ऐसा कथित निरंकुश आचरण जारी रहा तो उत्तर प्रदेश ऐसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है, जहां सरकारी शक्ति नागरिकों की स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण करने लगे। कोर्ट ने अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि उनकी संवैधानिक निष्ठा राजनीतिक कार्यपालिका के बजाय संविधान के प्रति होनी चाहिए।
यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अदालत ने इसे केवल एक व्यक्ति के मामले तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशासनिक शक्ति के इस्तेमाल और संवैधानिक जिम्मेदारी के व्यापक संदर्भ में देखा।
अब सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?
हाई कोर्ट के आदेश के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने की बात कही है। वहीं, डीएम मेधा रूपम की याचिका विशेष रूप से उनके खिलाफ मुआवजा वसूली और सर्विस रिकॉर्ड में टिप्पणी दर्ज करने जैसे निर्देशों से जुड़ी बताई गई है।
इसका मतलब है कि अब सुप्रीम कोर्ट के सामने हाई कोर्ट के आदेश के अलग-अलग पहलुओं पर कानूनी चुनौती सामने आ सकती है। अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी।
छात्रा की हिरासत पर भी जारी है कानूनी प्रक्रिया
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हाई कोर्ट द्वारा NSA हिरासत रद्द किए जाने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि आकृति चौधरी से जुड़े सभी आपराधिक मामले समाप्त हो गए हों। रिपोर्टों के अनुसार, वह श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों में न्यायिक हिरासत में बनी हुई थीं और उन मामलों की कानूनी प्रक्रिया अलग से चल रही है।
इसलिए NSA आदेश रद्द होने और बाकी मामलों में राहत मिलने को एक ही बात मानना सही नहीं होगा।

