झीरम घाटी कांड: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी मामले में एनआईए की विशेष अदालत के फैसले के बाद एक बार फिर मामला चर्चा में आ गया है। जगदलपुर की विशेष NIA अदालत ने सितंबर 2026 में मामले के 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया था। इसके बाद अब सर्व आदिवासी समाज ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। समाज की बैठक में मामले की व्यापक साजिश की दोबारा जांच की मांग भी उठाई गई है।
इस कानूनी लड़ाई के लिए बस्तर संभाग के आदिवासी परिवारों से स्वैच्छिक आर्थिक सहयोग जुटाने का फैसला लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक परिवार से 20 रुपये सहयोग लेने की योजना बनाई गई है। समाज का कहना है कि यह राशि हाईकोर्ट में कानूनी कार्रवाई से जुड़े खर्च में इस्तेमाल की जाएगी।
25 मई 2013 को क्या हुआ था?
झीरम घाटी हमला 25 मई 2013 को बस्तर के दरभा क्षेत्र में हुआ था। उस समय कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला सुकमा से लौट रहा था। इसी दौरान माओवादी हमलावरों ने काफिले को निशाना बनाया।
हमले में तत्कालीन छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल समेत कई राजनीतिक नेताओं, सुरक्षाकर्मियों और अन्य लोगों की मौत हुई थी। अलग-अलग रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 27 से 29 बताई गई है; NIA के रिकॉर्ड के आधार पर कई रिपोर्टों में 27 मौतों और 38 घायलों का उल्लेख है।
घटना के दो दिन बाद NIA ने जांच अपने हाथ में ली थी। एजेंसी ने 2014 में नौ आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की और 2015 में 30 अन्य आरोपियों के नाम वाली पूरक चार्जशीट दाखिल की। मामले की सुनवाई एक दशक से ज्यादा समय तक चली और अदालत में बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
10 आरोपियों को सुनाई गई मौत की सजा
जगदलपुर की विशेष NIA अदालत ने 5 सितंबर 2026 को 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 16 सितंबर को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया। रिपोर्टों के अनुसार, दोषियों को हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती देने के लिए 30 दिन का समय दिया गया है।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने बड़ी संख्या में गवाह पेश किए। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, मुकदमे में 294 से अधिक सुनवाई हुईं। मूल रूप से गिरफ्तार आरोपियों की संख्या 11 थी, लेकिन सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई। चार्जशीट में नामजद अन्य आरोपी अभी भी वांछित बताए गए हैं।
अब आदिवासी समाज क्यों जा रहा है हाईकोर्ट?
सर्व आदिवासी समाज की शुक्रवार को बस्तर के परपा स्थित कोया समाज भवन में बैठक हुई। इसमें बस्तर संभाग के छह जिलों—दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव, कांकेर और बस्तर—के प्रतिनिधियों के साथ दोषी ठहराए गए लोगों के परिजन भी शामिल हुए। लगभग तीन घंटे चली बैठक में आगे की कानूनी रणनीति पर चर्चा हुई।
समाज ने NIA अदालत के फैसले से जुड़े दस्तावेजों की कानूनी समीक्षा कराने और उसके बाद हाईकोर्ट में अपील की तैयारी करने का निर्णय लिया है। समाज के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा है कि जरूरत पड़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की दिशा में भी कदम उठाया जा सकता है।

परिजनों का क्या दावा है?
सजा पाए 10 लोगों के कुछ परिजनों ने दावा किया है कि उनके परिवार के सदस्य झीरम घाटी हमले में शामिल नहीं थे और उन्हें गलत तरीके से मामले में फंसाया गया। यह परिजनों का दावा है, जिसे अदालत के फैसले से अलग पक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर सर्व आदिवासी समाज ने कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने का फैसला किया है। समाज व्यापक साजिश की दोबारा जांच की मांग कर रहा है, जबकि NIA अदालत पहले ही 10 आरोपियों को दोषी ठहराकर उन्हें मृत्युदंड सुना चुकी है। अंतिम कानूनी स्थिति आगे हाईकोर्ट की कार्यवाही पर निर्भर करेगी।
39 आरोपियों में से 14 आत्मसमर्पण कर चुके
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा के अनुसार, NIA ने झीरम घाटी मामले में 39 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें से 14 लोग आत्मसमर्पण कर चुके हैं और पुनर्वासित जीवन जी रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि नौ आरोपी मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं, जबकि अन्य आरोपियों को लेकर अलग-अलग कानूनी स्थिति है।
यही वजह है कि झीरम घाटी मामले को लेकर अब केवल अदालत के फैसले पर ही नहीं, बल्कि अन्य आरोपियों की स्थिति और पूरे घटनाक्रम की जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अलग-अलग पक्षों की मांग और दावों को न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में ही देखा जाना जरूरी है।
आगे क्या होगा?
अब सर्व आदिवासी समाज हाईकोर्ट में अपील की तैयारी करेगा। इसके लिए फैसले और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा की जाएगी। इसके साथ ही कानूनी खर्च के लिए परिवारों से स्वैच्छिक सहयोग जुटाने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है।
हाईकोर्ट में अपील दाखिल होने के बाद अदालत यह तय करेगी कि निचली अदालत के फैसले को लेकर आगे किस तरह की न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इसलिए फिलहाल NIA अदालत के फैसले के खिलाफ प्रस्तावित अपील को अगले कानूनी चरण के रूप में देखना उचित होगा।
निष्कर्ष:
झीरम घाटी कांड में NIA विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद मामला एक नए कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। सर्व आदिवासी समाज ने फैसले की समीक्षा कर हाईकोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। समाज व्यापक साजिश की दोबारा जांच की मांग कर रहा है और कानूनी खर्च के लिए प्रत्येक आदिवासी परिवार से स्वैच्छिक रूप से 20 रुपये सहयोग जुटाने की योजना बनाई गई है। दूसरी ओर, NIA अदालत का फैसला न्यायिक प्रक्रिया का मौजूदा चरण है और आगे की स्थिति हाईकोर्ट में होने वाली कार्यवाही से स्पष्ट होगी।

