नई दिल्ली: देश में डिजिटल भुगतान लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद नकदी की मांग में कोई कमी नहीं आई है। बढ़ती कैश डिमांड, नोटों की छपाई पर बढ़ते खर्च और हर साल बड़ी संख्या में खराब होने वाले बैंकनोटों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंकनोट लाने की तैयारी कर रहा है। यदि यह योजना सफल होती है तो भारत भी उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां पारंपरिक कागजी नोटों की जगह टिकाऊ और सुरक्षित पॉलीमर नोटों का इस्तेमाल किया जाता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, RBI जल्द ही पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा कर सकता है। यह पिछले 16 वर्षों में तीसरा बड़ा प्रयास होगा। इससे पहले भी दो बार इस दिशा में पहल हुई थी, लेकिन तकनीकी और परिचालन संबंधी चुनौतियों के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी थी।
क्या होते हैं पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंकनोट?
पॉलीमर बैंकनोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक सब्सट्रेट से तैयार किए जाते हैं। इन्हें आम प्लास्टिक की तरह कठोर नहीं बनाया जाता, बल्कि ये हल्के, लचीले और सामान्य कागजी नोटों की तरह आसानी से इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इन नोटों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये पानी, नमी, धूल और बार-बार उपयोग से जल्दी खराब नहीं होते। यही वजह है कि इनकी उम्र पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है।
क्यों फिर शुरू हुई प्लास्टिक नोटों की चर्चा?
RBI की हालिया रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में नोटों की छपाई पर लगभग 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि पिछले वर्ष यह खर्च 5,101.4 करोड़ रुपये था। इसी दौरान करीब 23.8 अरब पुराने और खराब नोट चलन से बाहर किए गए।
सबसे अधिक खराब होने वाले नोटों में ₹500 और ₹100 के नोट शामिल रहे। वहीं ₹10 और ₹20 के नोट सबसे ज्यादा लेन-देन में उपयोग होने के कारण जल्दी फट जाते हैं। ऐसे में पॉलीमर नोट लंबे समय तक चल सकते हैं और नोटों की बार-बार छपाई की आवश्यकता कम होगी।
प्लास्टिक नोटों के क्या होंगे फायदे?
विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलीमर नोट कई मामलों में पारंपरिक नोटों से बेहतर साबित हो सकते हैं।
- अधिक टिकाऊ और लंबे समय तक उपयोग योग्य
- पानी और नमी से सुरक्षित
- जल्दी फटते या खराब नहीं होते
- नकली नोट बनाना काफी कठिन
- पारदर्शी सुरक्षा विंडो और आधुनिक सिक्योरिटी फीचर
- लंबे समय में छपाई की लागत में कमी
इन्हीं कारणों से दुनिया के कई देशों ने पॉलीमर करेंसी को अपनाया है।

भारत में पहले क्यों नहीं सफल हो पाई योजना?
भारत में पहली बार 2010 में पॉलीमर नोटों की योजना शुरू हुई थी। बाद में 2017 में भी इसे दोबारा मंजूरी मिली थी। हालांकि दोनों बार योजना कई कारणों से आगे नहीं बढ़ सकी।
सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि देशभर के अधिकांश ATM, कैश डिपॉजिट मशीनें और नोट गिनने वाली मशीनें केवल कागजी नोटों के हिसाब से डिजाइन की गई थीं। उन्हें पॉलीमर नोटों के अनुरूप बनाना काफी महंगा था।
इसके अलावा पॉलीमर शीट पूरी तरह विदेशों से आयात करनी पड़ती थी, जिससे लागत और बढ़ जाती थी।
इस बार क्या है नया?
इस बार RBI केवल पॉलीमर शीट खरीदने की बजाय भारत में ही इसका निर्माण कराने की दिशा में काम कर रहा है। यदि देश में उत्पादन शुरू होता है तो आयात पर निर्भरता कम होगी और लागत में भी कमी आएगी।
इसके साथ ही ATM, कैश डिपॉजिट मशीनों और नोट प्रोसेसिंग सिस्टम को भी पॉलीमर नोटों के अनुकूल बनाने की योजना तैयार की जा रही है। यही वजह है कि इस बार इस परियोजना की सफलता की संभावना पहले से अधिक मानी जा रही है।
किन देशों में पहले से चल रहे हैं प्लास्टिक नोट?
दुनिया के 60 से अधिक देशों ने पूरी तरह या आंशिक रूप से पॉलीमर करेंसी अपनाई है।
इनमें प्रमुख देश हैं—
- ऑस्ट्रेलिया
- कनाडा
- यूनाइटेड किंगडम
- सिंगापुर
- मलेशिया
- थाईलैंड
- इंडोनेशिया
- न्यूजीलैंड
- वियतनाम
- रोमानिया
ऑस्ट्रेलिया वर्ष 1988 में पॉलीमर नोट जारी करने वाला दुनिया का पहला देश बना था।
क्या सभी भारतीय नोट बदल जाएंगे?
फिलहाल ऐसा नहीं होगा। RBI पहले सीमित स्तर पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेगा। शुरुआती चरण में ₹10 और ₹20 के नोटों को पॉलीमर सामग्री में जारी किए जाने की संभावना है।
यदि परीक्षण सफल रहता है और आम लोगों तथा बैंकिंग व्यवस्था से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है, तभी चरणबद्ध तरीके से अन्य मूल्यवर्ग के नोट भी पॉलीमर में बदले जा सकते हैं।
क्या इससे आम लोगों को फायदा होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि पॉलीमर नोट सफल होते हैं तो आम लोगों को लंबे समय तक साफ-सुथरे और टिकाऊ नोट मिलेंगे। नकली नोटों पर भी काफी हद तक रोक लग सकेगी। साथ ही सरकार और RBI को हर साल नोटों की छपाई पर होने वाले भारी खर्च में भी राहत मिल सकती है।
निष्कर्ष
RBI का पॉलीमर नोटों को लेकर तीसरा प्रयास भारतीय करेंसी सिस्टम में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। बढ़ती नकदी की मांग, नोटों की बढ़ती छपाई लागत और नकली नोटों की चुनौती को देखते हुए यह कदम भविष्य की जरूरत माना जा रहा है। हालांकि अंतिम फैसला पायलट प्रोजेक्ट की सफलता और तकनीकी परीक्षणों पर निर्भर करेगा। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो आने वाले वर्षों में भारत की जेब में भी टिकाऊ और आधुनिक प्लास्टिक नोट दिखाई दे सकते हैं।

