पश्चिम बंगाल: में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच राजनीतिक बयानबाजी फिर तेज हो गई है। 27 सितंबर 2026 को शुभेंदु अधिकारी ने SIR के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर हटाए गए करीब 27 लाख नामों को लेकर ममता बनर्जी के आरोपों पर सवाल उठाए। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे केवल भारतीय जनता पार्टी या निर्वाचन आयोग की कार्रवाई के तौर पर पेश करना सही नहीं है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ममता बनर्जी SIR प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग पर लगातार सवाल उठाती रही हैं। 26 सितंबर को उन्होंने कहा था कि SIR के खिलाफ विरोध तब तक जारी रहेगा, जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते। इसके अगले दिन शुभेंदु अधिकारी ने ममता के आरोपों और विरोध के तरीके पर पलटवार किया।
SIR विवाद पर शुभेंदु अधिकारी ने क्या कहा?
शुभेंदु अधिकारी ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ से जुड़े मामलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि करीब 27 लाख नाम हटाए गए और इस प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों ने काम किया। उनके अनुसार, यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत हुई थी। उन्होंने ममता बनर्जी पर इस मुद्दे की जिम्मेदारी बीजेपी या चुनाव आयोग पर डालने का आरोप लगाया। ये शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक दावे हैं और इन्हें उसी रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर SIR को लेकर ममता बनर्जी को आपत्ति है तो दूसरे राज्यों में हुई ऐसी प्रक्रियाओं को लेकर उनका रुख क्या है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए विरोध को लेकर सवाल किया।
शुभेंदु का यह बयान ममता बनर्जी द्वारा SIR और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों की पृष्ठभूमि में आया है।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ क्या है?
पश्चिम बंगाल की SIR प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच की गई। इसी प्रक्रिया के दौरान कुछ मतदाताओं के रिकॉर्ड में ऐसी विसंगतियां चिन्हित की गईं जिन्हें ‘logical discrepancy’ के तौर पर वर्गीकृत किया गया।
ममता बनर्जी पहले इस श्रेणी पर सवाल उठा चुकी हैं। अप्रैल 2026 में उन्होंने दावा किया था कि ‘logical discrepancy’ निर्वाचन आयोग के सामान्य ढांचे में आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त शब्द नहीं है और इसे पश्चिम बंगाल में अलग तरीके से लागू किया गया। यह ममता बनर्जी का आरोप था।
दूसरी ओर, SIR प्रक्रिया में अदालतों की भूमिका भी रही। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारियों को मामलों की जांच के लिए लगाया गया था। लगभग 60 लाख मामलों की adjudication प्रक्रिया के बाद करीब 27 लाख नाम अंतिम रूप से हटाए गए।

27 लाख नाम हटने का मामला क्यों अहम है?
SIR के दौरान मतदाता सूची में बड़े स्तर पर बदलाव हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, करीब 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जबकि इन हटाए गए मतदाताओं की ओर से बड़ी संख्या में अपील भी दाखिल की गई।
सितंबर में सामने आए निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, हटाए गए मतदाताओं में से करीब 22.21 लाख अपीलें दाखिल की गई थीं। यह संख्या हटाए गए मतदाताओं के लगभग 81.8 प्रतिशत के बराबर बताई गई है।
इसी आंकड़े को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी है। इसलिए 27 लाख हटाए गए नामों को लेकर केवल राजनीतिक बयान ही नहीं, बल्कि अपील और पुनर्स्थापना की प्रक्रिया के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं।
ममता बनर्जी का SIR पर क्या रुख है?
ममता बनर्जी लगातार SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाती रही हैं। 26 सितंबर को सेरामपुर में एक सभा के दौरान उन्होंने निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाया कि SIR के जरिए वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए और उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त पद से नहीं हटते।
इससे एक दिन बाद शुभेंदु अधिकारी ने ममता के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने SIR के तहत हुई adjudication प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारियों की भूमिका को अपने तर्क का आधार बनाया।
न्यायिक प्रक्रिया की क्या भूमिका रही?
SIR से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और निर्देश महत्वपूर्ण रहे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने लगभग 60 लाख मामलों की adjudication में भूमिका निभाई। इसके बाद करीब 27 लाख नाम हटाए गए।
इसके बाद हटाए गए मतदाताओं को अपील का रास्ता दिया गया। कैल्कटा हाईकोर्ट द्वारा गठित अपीलीय ट्रिब्यूनलों के जरिए इन मामलों की सुनवाई की व्यवस्था की गई। सितंबर तक निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल होने की जानकारी सामने आई।
इसलिए SIR पर जारी राजनीतिक विवाद में दो अलग-अलग सवाल हैं—एक, नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक आरोप; दूसरा, हटाए गए नामों के खिलाफ उपलब्ध कानूनी अपील प्रक्रिया और उसके परिणाम।
‘विरोध’ को लेकर भी शुभेंदु ने उठाया सवाल
शुभेंदु अधिकारी ने SIR को लेकर ममता बनर्जी के विरोध पर भी सवाल उठाया। उन्होंने दूसरे राज्यों में चुनावी सूची से जुड़े revision का उल्लेख करते हुए पूछा कि यदि SIR जैसी प्रक्रिया अन्य राज्यों में भी हुई, तो वहां इसी स्तर का विरोध क्यों नहीं हुआ।
यह तर्क शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक बयान का हिस्सा है। अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया, नियम और न्यायिक हस्तक्षेप अलग परिस्थितियों में हुए हैं, इसलिए केवल राजनीतिक बयान के आधार पर इन प्रक्रियाओं को समान मानना उचित नहीं होगा।

