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Home - वायरल न्यूज़ - जलती चिताओं के बीच रातभर नृत्य! मणिकर्णिका घाट की 350 साल पुरानी रहस्यमयी परंपरा ने फिर खींचा ध्यान

जलती चिताओं के बीच रातभर नृत्य! मणिकर्णिका घाट की 350 साल पुरानी रहस्यमयी परंपरा ने फिर खींचा ध्यान

Rajat Kumar
Last updated: 2026/03/25 at 10:29 PM
Rajat Kumar
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4 Min Read
जलती चिताओं के बीच रातभर नृत्य! मणिकर्णिका घाट की 350 साल पुरानी रहस्यमयी परंपरा ने फिर खींचा ध्यान
जलती चिताओं के बीच रातभर नृत्य! मणिकर्णिका घाट की 350 साल पुरानी रहस्यमयी परंपरा ने फिर खींचा ध्यान
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उत्तर प्रदेश: के वाराणसी में चैत्र नवरात्र के दौरान एक ऐसी अनोखी और रहस्यमयी परंपरा निभाई जाती है, जो आस्था, अध्यात्म और परंपरा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। महाश्मशान के रूप में प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच नगर वधुएं पूरी रात नृत्य कर भगवान शिव को अपनी नृत्यांजलि अर्पित करती हैं।

Contents
आस्था और मोक्ष की अनोखी परंपरा350 साल पुरानी परंपरानगर वधुओं ने निभाई परंपराआज भी जीवित है परंपरासंस्कृति और आध्यात्म का संगमश्रद्धालुओं की भीड़ और उत्साहनिष्कर्ष:

यह परंपरा चैत्र नवरात्र की षष्ठी तिथि की रात विशेष रूप से आयोजित होती है। इस दौरान घाट पर एक ओर अंतिम संस्कार की चिताएं जलती रहती हैं, वहीं दूसरी ओर संगीत, भजन और नृत्य का अद्भुत वातावरण बनता है। इस दृश्य को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं।

मणिकर्णिका घाट की अनोखी परंपरा
मणिकर्णिका घाट की अनोखी परंपरा

आस्था और मोक्ष की अनोखी परंपरा

मान्यता है कि इस अनूठी परंपरा के माध्यम से नगर वधुएं अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति और अगले जन्म को बेहतर बनाने की कामना करती हैं। हिंदू धर्म में काशी को मोक्ष की नगरी माना जाता है, और मणिकर्णिका घाट को विशेष रूप से मोक्ष प्राप्ति का द्वार कहा जाता है।

इसी आस्था के चलते नगर वधुएं यहां आकर भगवान शिव, जिन्हें नटराज के रूप में भी पूजा जाता है, के समक्ष नृत्य अर्पित करती हैं। यह नृत्य केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना के रूप में देखा जाता है।

350 साल पुरानी परंपरा

इस परंपरा का इतिहास लगभग 350 वर्षों पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि इसकी शुरुआत राजा मानसिंह के समय हुई थी। उस समय काशी में एक मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद वहां धार्मिक अनुष्ठानों के लिए संगीत कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई गई।

हालांकि, महाश्मशान में होने के कारण कोई भी कलाकार वहां प्रस्तुति देने को तैयार नहीं हुआ। यह स्थिति राजा मानसिंह के लिए चिंता का विषय बन गई, क्योंकि हिंदू परंपराओं में संगीत और नृत्य का विशेष महत्व होता है।

जलती चिताओं के बीच रातभर नृत्य! मणिकर्णिका घाट की 350 साल पुरानी रहस्यमयी परंपरा ने फिर खींचा ध्यान
जलती चिताओं के बीच रातभर नृत्य! मणिकर्णिका घाट की 350 साल पुरानी रहस्यमयी परंपरा ने फिर खींचा ध्यान

नगर वधुओं ने निभाई परंपरा

जब कोई कलाकार आगे नहीं आया, तो यह संदेश धीरे-धीरे पूरे नगर में फैल गया और अंततः काशी की नगर वधुओं तक पहुंचा। उन्होंने पहल करते हुए राजा मानसिंह को संदेश भेजा कि यदि उन्हें अनुमति दी जाए, तो वे भगवान के समक्ष नृत्य प्रस्तुत कर सकती हैं।

नगर वधुओं की इस भावना से प्रभावित होकर राजा मानसिंह ने उन्हें अनुमति दी। तभी से यह परंपरा शुरू हुई और आज तक निरंतर जारी है।

जलती चिताओं और महाश्मशान के बीच नगर वधुएं पूरी रात नृत्य कर अपनी नृत्यांजलि अर्पित करती हैं।
जलती चिताओं और महाश्मशान के बीच नगर वधुएं पूरी रात नृत्य कर अपनी नृत्यांजलि अर्पित करती हैं।

आज भी जीवित है परंपरा

समय के साथ समाज और परिस्थितियां बदलती गईं, लेकिन यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। नगर वधुएं देश के विभिन्न हिस्सों से काशी पहुंचती हैं और इस विशेष अवसर पर अपनी नृत्यांजलि अर्पित करती हैं।

कार्यक्रम के दौरान ‘दुर्गा दुर्गति नाशिनी’, ‘ओम नमः शिवाय’, ‘बम लहरी’ जैसे भजनों के साथ दादरा, ठुमरी और चैती प्रस्तुत की जाती हैं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।

संस्कृति और आध्यात्म का संगम

यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता को भी दर्शाता है। जहां एक ओर मृत्यु का दृश्य है, वहीं दूसरी ओर जीवन, कला और भक्ति का उत्सव भी चलता है।

यह परंपरा यह भी दर्शाती है कि भारतीय समाज में हर व्यक्ति को अपनी आस्था व्यक्त करने का अधिकार है, चाहे उसकी सामाजिक स्थिति कुछ भी क्यों न हो। नगर वधुओं का यह नृत्य समाज में उनके अस्तित्व और आस्था की एक सशक्त अभिव्यक्ति भी है।

काशी के महाश्मशान से जुड़ी यह परंपरा करीब 350 वर्षों से भी अधिक पुरानी बताई जाती है।
काशी के महाश्मशान से जुड़ी यह परंपरा करीब 350 वर्षों से भी अधिक पुरानी बताई जाती है।

श्रद्धालुओं की भीड़ और उत्साह

हर साल इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मणिकर्णिका घाट पर जुटते हैं। स्थानीय प्रशासन भी इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के विशेष इंतजाम करता है, ताकि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।

यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी वाराणसी की पहचान को और मजबूत करता है।

ये भी पढ़ें: लोकसभा में नरेंद्र मोदी का बयान—पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत ने बनाई मजबूत रणनीति, ऊर्जा और नागरिकों की सुरक्षा पर फोकस


निष्कर्ष:

मणिकर्णिका घाट की यह परंपरा भारतीय संस्कृति की गहराई, आस्था और अध्यात्म का अद्भुत उदाहरण है। जलती चिताओं के बीच नगर वधुओं का नृत्य जीवन और मृत्यु के बीच संतुलन का संदेश देता है और मोक्ष की अवधारणा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।

TAGGED: Chaitra Navratri, Hindu Rituals, Indian Culture, Kashi Tradition, Manikarnika Ghat, Nagar Vadhu Tradition, Spiritual India, Varanasi News
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