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Home - राज्य - UPI और डिजिटल इंडिया के दौर में भी यहां नहीं चलता पैसा, शिपकी ला में आज भी सामान के बदले सामान का होता है व्यापार

UPI और डिजिटल इंडिया के दौर में भी यहां नहीं चलता पैसा, शिपकी ला में आज भी सामान के बदले सामान का होता है व्यापार

Rajat Kumar
Last updated: 2026/08/03 at 3:12 PM
Rajat Kumar
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5 Min Read
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भारत: आज डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। यूपीआई (UPI), ऑनलाइन बैंकिंग और कैशलेस लेनदेन ने आम लोगों की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन इसी भारत में एक ऐसी जगह भी है, जहां आज भी न नकद चलता है और न ही डिजिटल भुगतान। यहां सदियों पुरानी वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) के तहत सामान के बदले सामान का लेनदेन किया जाता है।

Contents
छह साल बाद फिर शुरू हुआ सीमा व्यापार1697 में रखी गई थी इस परंपरा की नींवकिन गांवों के व्यापारी करते हैं व्यापार?1962 के युद्ध के बाद बंद हो गया था व्यापार30 नवंबर तक चलेगा कारोबारी सीजनक्या होती है वस्तु विनिमय प्रणाली?शिपकी ला क्यों है खास?सीमा व्यापार से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभनिष्कर्ष:

यह अनोखी परंपरा हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले स्थित शिपकी ला में देखने को मिलती है, जहां भारत-चीन सीमा व्यापार करीब 329 साल पुरानी परंपरा के अनुसार संचालित होता है। खास बात यह है कि यह व्यवस्था वर्ष 1697 में हुई एक ऐतिहासिक संधि पर आधारित है और आज भी उसी विश्वास और नियमों के साथ कायम है।


छह साल बाद फिर शुरू हुआ सीमा व्यापार

हाल ही में लगभग छह वर्ष के लंबे अंतराल के बाद शिपकी ला, लिपुलेख (उत्तराखंड) और नाथू ला (सिक्किम) के रास्ते भारत-चीन सीमा व्यापार दोबारा शुरू किया गया।

हालांकि इन तीनों मार्गों में शिपकी ला सबसे अलग माना जाता है, क्योंकि यहां व्यापार का तरीका आज भी आधुनिक मुद्रा प्रणाली से अलग है। यहां व्यापारी नकद, बैंक ट्रांसफर या डिजिटल भुगतान का उपयोग नहीं करते, बल्कि वस्तुओं का सीधा आदान-प्रदान करते हैं।


1697 में रखी गई थी इस परंपरा की नींव

इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1697 में तत्कालीन बुशहर रियासत और तिब्बत के बीच सीमा व्यापार को लेकर एक विशेष संधि हुई थी।

इस संधि की सबसे अनोखी बात यह थी कि इसे किसी लिखित दस्तावेज पर नहीं, बल्कि स्थानीय पारंपरिक लोक शपथ ‘गामग्या’ और आपसी विश्वास के आधार पर स्वीकार किया गया था।

यही कारण है कि तीन शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह परंपरा आज भी जीवित है।


किन गांवों के व्यापारी करते हैं व्यापार?

इस व्यापार में केवल सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत स्थानीय व्यापारी ही भाग ले सकते हैं।

इन गांवों में प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  • नामगिया
  • चुप्पन
  • नाको
  • पूह
  • चांगो

सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार केवल अधिकृत व्यापारी ही सीमा पार जाकर निर्धारित वस्तुओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं।


1962 के युद्ध के बाद बंद हो गया था व्यापार

भारत-चीन के बीच वर्ष 1962 के युद्ध के बाद इस मार्ग से होने वाला व्यापार पूरी तरह बंद कर दिया गया था।

इसके बाद दोनों देशों के बीच बने द्विपक्षीय समझौतों और प्रोटोकॉल के तहत 1992-94 के दौरान इसे दोबारा शुरू किया गया।

हालांकि समय-समय पर इसमें भाग लेने वाले व्यापारियों की संख्या बदलती रही।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—

  • 1994 में सबसे अधिक 90 व्यापारी शामिल हुए।
  • 2015 में 71 व्यापारी
  • 2016 में 75 व्यापारी
  • 2017 में 34 व्यापारी
  • 2018 में 37 व्यापारी
  • 2019 में 45 व्यापारी सीमा व्यापार में शामिल हुए।

अब छह साल बाद फिर से व्यापार शुरू होने से स्थानीय लोगों में उत्साह देखा जा रहा है।


30 नवंबर तक चलेगा कारोबारी सीजन

शिपकी ला ट्रेड ऑफिसर भीम सिंह के अनुसार इस वर्ष सीमा व्यापार का सीजन 30 नवंबर तक चलने की संभावना है।

सरकार ने आयात और निर्यात के लिए पहले से निर्धारित वस्तुओं की सूची जारी की है। केवल उन्हीं वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाएगा।

इस बार भी व्यापार केवल पुह उपमंडल के सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत व्यापारियों तक सीमित रखा गया है।


क्या होती है वस्तु विनिमय प्रणाली?

वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) दुनिया की सबसे पुरानी आर्थिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है।

इस व्यवस्था में किसी प्रकार की मुद्रा का उपयोग नहीं किया जाता।

उदाहरण के लिए—

  • किसान गेहूं देकर चावल लेता है।
  • ऊन के बदले नमक या सूखे मेवे प्राप्त किए जाते हैं।
  • फल के बदले कपड़े या अन्य वस्तुएं ली जाती हैं।

यानी एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु या सेवा का आदान-प्रदान ही वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है।


शिपकी ला क्यों है खास?

जहां पूरी दुनिया डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है, वहीं शिपकी ला आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखे हुए है।

यह केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि भारत और तिब्बत के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों का प्रतीक भी माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह परंपरा स्थानीय समुदायों की आपसी विश्वसनीयता, सांस्कृतिक विरासत और सीमा क्षेत्रों की विशिष्ट पहचान को आज भी जीवित रखे हुए है।


सीमा व्यापार से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभ

छह साल बाद व्यापार दोबारा शुरू होने से सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने की उम्मीद है।

स्थानीय व्यापारियों को पारंपरिक व्यापार का अवसर मिलेगा, जबकि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत भी नई पीढ़ी तक पहुंचेगी।

सरकार भी इस व्यापार को निर्धारित नियमों के तहत सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से संचालित करने पर जोर दे रही है।


निष्कर्ष:

डिजिटल भुगतान और आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था के इस दौर में शिपकी ला की वस्तु विनिमय प्रणाली दुनिया के लिए एक अनोखी मिसाल है। 1697 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी भारत-चीन सीमा पर जीवित है और बताती है कि विश्वास, संस्कृति और इतिहास कई बार तकनीक से भी ज्यादा मजबूत होते हैं। छह साल बाद फिर शुरू हुआ यह सीमा व्यापार न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा, बल्कि भारत की ऐतिहासिक विरासत को भी नई पहचान देगा।

TAGGED: Barter System, Border Trade, Economy News, Himachal Pradesh, India China Border, India China Relations, Kinnaur News, Shipki La, Tibet Trade, Trade System
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