Two Finger Test पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, रेप पीड़िताओं के सम्मान को दी प्राथमिकता
महिलाओं की गरिमा, निजता और मानवाधिकारों से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में रेप पीड़िताओं पर किए जाने वाले विवादित Two Finger Test को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। अदालत ने इसे अमानवीय, अपमानजनक और महिलाओं के सम्मान के खिलाफ बताया है।
मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह आदेश रेप पीड़िताओं के संरक्षण और पुनर्वास से संबंधित स्वतः संज्ञान जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन हिंसा की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने के बजाय उन्हें बार-बार मानसिक पीड़ा और सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ता है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।
क्या होता है Two Finger Test?
टू-फिंगर टेस्ट, जिसे आम बोलचाल में “कौमार्य परीक्षण” भी कहा जाता है, ब्रिटिश काल से चली आ रही एक विवादास्पद मेडिकल प्रक्रिया है। इसमें डॉक्टर पीड़िता की योनि में दो उंगलियां डालकर यह जांच करने की कोशिश करते थे कि महिला पहले से यौन संबंधों की आदी है या नहीं।
इस जांच के आधार पर महिला की “यौन सक्रियता” या “वर्जिनिटी” का अनुमान लगाया जाता था। हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और कानून दोनों ही इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक रूप से गलत और मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी महिला की सहमति, चरित्र या यौन इतिहास का बलात्कार की घटना से कोई संबंध नहीं होता। इसलिए इस तरह की जांच न केवल अपमानजनक है बल्कि पीड़िता को दोबारा मानसिक आघात पहुंचाने का काम करती है।
हाईकोर्ट ने दिए कई अहम निर्देश
झारखंड हाईकोर्ट ने केवल टू-फिंगर टेस्ट पर रोक लगाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि रेप मामलों की जांच और पीड़िताओं के पुनर्वास को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए।
अदालत ने कहा कि:
- सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में टू-फिंगर टेस्ट पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाए।
- यदि कोई डॉक्टर या पैरामेडिकल स्टाफ इस परीक्षण को करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए।
- ऐसे कृत्य को पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) माना जाए।
- रेप पीड़िताओं की मेडिकल जांच और बयान दर्ज करने में देरी न हो।
- पहले जीरो एफआईआर दर्ज की जाए और बाद में संबंधित थाने को स्थानांतरित किया जाए।
- पुलिस अधिकारियों को मानवाधिकार और संवेदनशील जांच प्रक्रिया का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए।
- पीड़िताओं को मुफ्त और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराया जाए।
- सरकार रोजगार और कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से पीड़िताओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य करे।

मीडिया के लिए भी सख्त निर्देश
हाईकोर्ट ने मीडिया संस्थानों को भी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी परिस्थिति में रेप पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जानी चाहिए।
प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़िता का नाम, फोटो या कोई भी ऐसी जानकारी प्रकाशित न हो जिससे उसकी पहचान सामने आए।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही बता चुका है अवैध
दरअसल, Two Finger Test को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार अपनी सख्त राय व्यक्त कर चुका है।
साल 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यह जांच महिला की गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
इसके बाद 2022 में न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने भी इस परीक्षण की कड़ी आलोचना की थी। सुप्रीम कोर्ट ने तब केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि मेडिकल शिक्षा के पाठ्यक्रम से भी इस प्रथा को हटाया जाए ताकि भविष्य में कोई डॉक्टर इसका इस्तेमाल न करे।
महिलाओं की गरिमा की दिशा में बड़ा कदम
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला महिलाओं के सम्मान और मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लंबे समय से महिला अधिकार संगठन इस प्रथा को समाप्त करने की मांग कर रहे थे।
यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि न्याय प्रणाली अब पीड़िताओं को संदेह की नजर से नहीं बल्कि सम्मान और संवेदनशीलता के साथ देखने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
निष्कर्ष
झारखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल एक मेडिकल प्रक्रिया पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की गरिमा, निजता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का मजबूत संदेश भी देता है। अदालत ने साफ कर दिया है कि रेप पीड़िताओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया खुद उनके लिए दूसरी सजा नहीं बननी चाहिए। अब जरूरत है कि सभी राज्यों में इस आदेश की भावना के अनुरूप सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।


