वृंदावन (मथुरा)। ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में भगवान की सेवा और मंदिर की संपत्तियों से जुड़े अधिकारों को लेकर चली आ रही व्यवस्थाओं के बीच अब करीब आठ साल पुराने चांदी के रथ ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। रथ को लेकर मंदिर की उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति और सेवायत पक्ष की राय अलग-अलग सामने आ रही है।
मामला तब और गंभीर हो गया जब मंदिर प्रबंधन समिति की ओर से गठित जांच समिति ने संबंधित सेवायत को नोटिस जारी कर जांच में सहयोग करने और रथ को सुरक्षित रखने को कहा। नोटिस के बाद सेवायतों में नाराजगी बताई जा रही है और सेवायत पक्ष इस मामले में कानूनी राय लेने की तैयारी कर रहा है।
विवाद का मुख्य सवाल यही है कि जिस चांदी के रथ को वर्षों से ठाकुर बांकेबिहारी की झांकी में इस्तेमाल किया जाता रहा, उसका कानूनी स्वामित्व मंदिर का है या सेवायत के निजी ट्रस्ट का?
कैसे शुरू हुआ चांदी के रथ का मामला?
जानकारी के अनुसार, लगभग आठ वर्ष पहले जगन्नाथ रथयात्रा के अवसर पर ठाकुर बांकेबिहारीजी की फूलबंगला झांकी में इस्तेमाल के लिए एक श्रद्धालु ने चांदी का रथ भेंट किया था।
सेवायत पक्ष का कहना है कि यह रथ उनके यजमान ने सेवायत ब्रजेंद्र गोस्वामी के निजी ट्रस्ट को दान किया था। इसी आधार पर सेवायत इस रथ को अपने ट्रस्ट की संपत्ति मानते हैं।
दूसरी तरफ मंदिर की उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति इस बात की जांच कर रही है कि श्रद्धालु ने रथ वास्तव में मंदिर के नाम पर दिया था या सेवायत के निजी ट्रस्ट के नाम पर।
यही दस्तावेजी और कानूनी स्थिति फिलहाल पूरे विवाद का केंद्र बनी हुई है।

इस साल क्यों नहीं हुई चांदी के रथ की झांकी?
बताया गया है कि पिछले वर्षों में जगन्नाथ रथयात्रा के अवसर पर फूलबंगला की विशेष झांकी में चांदी के रथ के साथ ठाकुर बांकेबिहारीजी के दर्शन होते रहे हैं।
हालांकि इस वर्ष सेवायत ब्रजेंद्र गोस्वामी ने चांदी के रथ की झांकी नहीं सजाई। सेवायत पक्ष के अनुसार, रथ उनके निजी ट्रस्ट की संपत्ति है और इसको लेकर स्वामित्व का सवाल उठाए जाने के बाद उन्होंने झांकी नहीं सजाई।
इसके बाद मंदिर प्रबंधन समिति ने पूरे मामले की जांच के लिए समिति गठित की।
नोटिस के बाद बढ़ा विवाद
जांच समिति की ओर से सेवायत को नोटिस दिए जाने के बाद मामला और चर्चा में आ गया। रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार को समिति के आदेश पर सीओ वृंदावन और अपर जिला मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया।
नोटिस में रथ को सुरक्षित रखने और जांच में सहयोग करने को कहा गया है।
मंदिर प्रबंधन की जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना बताया जा रहा है कि रथ की वास्तविक स्थिति और स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज क्या कहते हैं।
हालांकि, अभी तक जांच पूरी नहीं हुई है और स्वामित्व को लेकर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।
सेवायत पक्ष क्यों नाराज है?
सेवायत पक्ष का तर्क है कि मंदिर में ठाकुरजी की सेवा के दौरान गर्भगृह में अर्पित होने वाली भेंट, आभूषण और अन्य सामग्री को लेकर परंपरागत रूप से सेवायतों के अधिकार की व्यवस्था रही है।
उनका कहना है कि यदि किसी यजमान ने किसी सेवायत को वस्तु व्यक्तिगत रूप से अर्पित की और उसे सेवायत के ट्रस्ट के नाम दान किया, तो मंदिर प्रबंधन समिति उसे स्वतः मंदिर की संपत्ति मानकर जांच कैसे कर सकती है—यह कानूनी सवाल है।
इसी मुद्दे को लेकर सेवायत अब विशेषज्ञों से कानूनी राय लेने की तैयारी में हैं।
मंदिर में चढ़ावे और भेंट की व्यवस्था अलग-अलग
बांकेबिहारी मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, मंदिर की गोलक और कार्यालय में श्रद्धालुओं की ओर से दी जाने वाली नकद राशि तथा आभूषण मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्था के तहत जमा होते हैं।
वहीं गर्भगृह में ठाकुरजी की सेवा के दौरान अर्पित की जाने वाली कुछ भेंट और सामग्री को लेकर सेवायतों की पारंपरिक भूमिका रही है।
यही अंतर चांदी के रथ के मामले को जटिल बनाता है। सवाल यह है कि रथ किस श्रेणी में आता है और उसे दान किए जाने के समय दानदाता की वास्तविक मंशा क्या थी।
अब दस्तावेजों से तय होगी आगे की दिशा
पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन दस्तावेजों की हो सकती है जिनके आधार पर रथ दान किया गया था। यदि दान-पत्र, ट्रस्ट से जुड़े रिकॉर्ड या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं तो उनसे स्वामित्व की स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल सेवायत पक्ष नोटिस का जवाब देने से पहले कानूनी राय ले रहा है। वहीं मंदिर प्रबंधन की जांच भी आगे बढ़ रही है।
ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच समिति के सामने कौन से दस्तावेज पेश होते हैं और दोनों पक्ष अपने अधिकारों के समर्थन में क्या कानूनी आधार रखते हैं।
विवाद का धार्मिक परंपरा से भी जुड़ा पहलू
बांकेबिहारी मंदिर में वर्षभर अलग-अलग पर्वों और उत्सवों पर विशेष झांकियां सजाई जाती हैं। इनमें ठाकुरजी के श्रृंगार और फूलबंगला की सजावट का विशेष महत्व माना जाता है।
चांदी के रथ की झांकी भी इसी परंपरा का हिस्सा रही है। इसलिए रथ के स्वामित्व का विवाद केवल संपत्ति से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि मंदिर की धार्मिक परंपरा और सेवायत व्यवस्था से भी जुड़ गया है।

