पटना: बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने शिक्षकों के स्थानांतरण (ट्रांसफर) को अधिक पारदर्शी और संवेदनशील बनाने की दिशा में नई नियमावली तैयार की है। इस प्रस्तावित व्यवस्था में पहली बार कुछ विशेष श्रेणी के शिक्षकों को स्पष्ट प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया है। इनमें 40 वर्ष से अधिक उम्र की अविवाहित महिला शिक्षक, कानूनी रूप से अलग रह रही महिला शिक्षक, गंभीर बीमारियों से पीड़ित शिक्षक, दिव्यांग शिक्षक तथा राष्ट्रीय और राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक शामिल हैं।
नई नियमावली का उद्देश्य ऐसे शिक्षकों को उनकी व्यक्तिगत, पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्थानांतरण प्रक्रिया में राहत प्रदान करना है।
40 वर्ष से अधिक उम्र की अविवाहित महिला शिक्षकों को मिलेगी प्राथमिकता
नई नियमावली का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान 40 वर्ष से अधिक आयु की अविवाहित महिला शिक्षकों को लेकर किया गया है। शिक्षा विभाग के अनुसार, यदि कोई अविवाहित महिला शिक्षक 40 वर्ष या उससे अधिक आयु की है और स्थानांतरण के लिए आवेदन करती है, तो उसकी पसंद के विद्यालय या स्थान को प्राथमिकता देने का प्रयास किया जाएगा।
इसी प्रकार, जो महिला शिक्षक कानूनी रूप से अपने पति से अलग रह रही हैं, उन्हें भी ट्रांसफर प्रक्रिया में विशेष वरीयता दी जाएगी। विभाग का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में कार्यस्थल का चयन उनके सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
छोटे विद्यालयों में नहीं होगा वरीयता श्रेणी का समायोजन
नियमावली में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन विद्यालयों में स्वीकृत शिक्षकों की संख्या चार से कम है, वहां वरीयता श्रेणी के आधार पर स्थानांतरण पर सामान्यतः विचार नहीं किया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसे स्कूलों में शिक्षकों की कमी को और अधिक बढ़ने से रोकना है।

गंभीर बीमारी से पीड़ित शिक्षकों को विशेष राहत
नई ट्रांसफर नीति में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे शिक्षकों के लिए विस्तृत प्रावधान किए गए हैं।
वरीयता श्रेणी में शामिल प्रमुख बीमारियां हैं—
- कैंसर
- ओपन हार्ट सर्जरी
- एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट (ASD)
- अंग प्रत्यारोपण
- एकल किडनी
- किडनी ट्रांसप्लांट
- डायलिसिस
- ब्रेन ट्यूमर
- न्यूरो सर्जरी
- बोन टीबी एवं अन्य गंभीर टीबी
- पक्षाघात (लकवा)
इन मामलों में शिक्षक स्वयं बीमार होने पर अधिक वरीयता मिलेगी। यदि शिक्षक की पत्नी गंभीर बीमारी से पीड़ित है या 18 वर्ष से कम आयु का आश्रित बच्चा ऐसी बीमारी से ग्रस्त है, तो भी निर्धारित प्रतिशत के अनुसार प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया है।
दिव्यांग शिक्षकों के लिए भी विशेष प्रावधान
नई नियमावली में 80 से 100 प्रतिशत तक की दिव्यांगता वाले शिक्षकों को भी विशेष प्राथमिकता दी जाएगी।
इसमें निम्न प्रकार की दिव्यांगताएं शामिल हैं—
- दृष्टिबाधित
- श्रवण बाधित
- अस्थि (ऑर्थोपेडिक) दिव्यांगता
शिक्षा विभाग का मानना है कि ऐसे शिक्षकों को उनके स्वास्थ्य और सुविधा के अनुरूप कार्यस्थल उपलब्ध कराना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
मेडिकल बोर्ड करेगा जांच
बीमारी अथवा दिव्यांगता के आधार पर मिलने वाली वरीयता का दुरुपयोग न हो, इसके लिए शिक्षा विभाग ने मेडिकल बोर्ड के गठन का निर्णय लिया है।
यह बोर्ड सभी संबंधित दस्तावेजों और चिकित्सकीय प्रमाणपत्रों की जांच करेगा। जांच के बाद ही किसी शिक्षक को वरीयता श्रेणी का लाभ दिया जाएगा।
गलत दावा करने पर होगी कार्रवाई
यदि कोई शिक्षक बीमारी, दिव्यांगता या अन्य किसी वरीयता श्रेणी का गलत दावा करता है, तो संबंधित जिले के जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) द्वारा जांच कराई जाएगी।
जांच से पहले संबंधित शिक्षक को अपना पक्ष रखने के लिए सात दिन का समय दिया जाएगा। यदि दावा गलत पाया जाता है, तो शिक्षक के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ वैधानिक कार्रवाई भी की जाएगी।
पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को भी मिलेगा लाभ
नई नियमावली में उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को भी सम्मान देने का प्रावधान रखा गया है।
- राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को स्थानांतरण में 10 प्रतिशत वरीयता मिलेगी।
- राज्य शिक्षक पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को 5 प्रतिशत अतिरिक्त वरीयता दी जाएगी।
इसका उद्देश्य उत्कृष्ट शिक्षण कार्य को प्रोत्साहित करना और सम्मानित शिक्षकों को सुविधाजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराना है।
अगले ट्रांसफर चक्र में फिर मिलेगा मौका
यदि कोई पात्र शिक्षक वरीयता श्रेणी के तहत आवेदन करता है लेकिन किसी कारणवश उसका स्थानांतरण नहीं हो पाता, तो वह अगले स्थानांतरण चक्र में दोबारा उसी श्रेणी के तहत आवेदन कर सकेगा। इससे पात्र शिक्षकों को भविष्य में भी अवसर मिलता रहेगा।
निष्कर्ष
बिहार शिक्षा विभाग की नई शिक्षक स्थानांतरण नियमावली संवेदनशील और पारदर्शी व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसमें महिला शिक्षकों, गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों, दिव्यांग शिक्षकों और उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष वरीयता देने का प्रयास किया गया है। साथ ही, फर्जी दावों पर सख्त कार्रवाई और मेडिकल बोर्ड की जांच जैसी व्यवस्थाएं इस नीति को अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।

