लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
नई दिल्ली। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले वयस्कों के अधिकारों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा और सहमति से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो उनके रिश्ते में माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त जबरन हस्तक्षेप नहीं कर सकते। खास तौर पर किसी व्यक्ति को उनकी जान या स्वतंत्रता के लिए धमकी देने का अधिकार नहीं है।
अदालत की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक कपल ने परिवार की ओर से कथित धमकियों के बाद सुरक्षा की मांग की थी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने की और 13 अगस्त को आदेश पारित किया।
परिवार के विरोध के बाद कोर्ट पहुंचा कपल
याचिका दायर करने वाले दोनों लोग 30 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्क हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि वे कुछ समय से एक-दूसरे के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। दोनों भविष्य में शादी करने का इरादा भी रखते हैं।
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, महिला के पिता और भाई इस रिश्ते से सहमत नहीं थे। आरोप था कि दोनों की ओर से कपल को लगातार हिंसा की धमकियां दी जा रही थीं। स्थिति को लेकर कपल ने स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत भी की थी, लेकिन उनकी शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया और अपनी जान-माल तथा स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।
‘अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार’
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने वयस्कों की व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि जब दो वयस्क अपनी इच्छा, सहमति और जिम्मेदारी के साथ एक-दूसरे के साथ रहने का निर्णय लेते हैं, तो किसी तीसरे व्यक्ति को उनके फैसले में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
अदालत के मुताबिक, इसमें माता-पिता, रिश्तेदार और दोस्त भी शामिल हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को कपल की जान या स्वतंत्रता के लिए धमकी देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यही वजह है कि अदालत ने संबंधित कपल को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

शादी नहीं, फिर भी रिश्ते को मिली कानूनी सुरक्षा
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता कानूनी रूप से एक-दूसरे से विवाहित नहीं हैं, लेकिन दोनों सहमति से वयस्क हैं और अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं। ऐसे रिश्ते को केवल इस आधार पर असुरक्षित नहीं माना जा सकता कि दोनों ने शादी नहीं की है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद के अधिकार पर जोर दिया। अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि किसी व्यक्ति के निजी जीवन और संबंध को केवल सामाजिक असहमति या पारिवारिक दबाव के आधार पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
सामाजिक पूर्वाग्रहों पर भी अदालत की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के आधार पर मौलिक अधिकारों को सीमित करने के खिलाफ भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामाजिक धारणाओं के आधार पर कम नहीं किया जा सकता।
अदालत ने विवाह के संदर्भ में भी कहा कि सहमति से अपने जीवनसाथी का चुनाव करने वाले वयस्कों के अधिकारों को जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था जैसे आधारों पर सीमित नहीं किया जा सकता।
इस टिप्पणी का व्यापक अर्थ यह है कि वयस्क व्यक्ति के निजी फैसले में समाज या परिवार की पसंद को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही यह मान चुकी है कि विवाह न होने की स्थिति में भी वयस्कों को अपनी इच्छा के अनुसार एक-दूसरे के साथ रहने का अधिकार है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के विभिन्न प्रावधानों में ऐसे रिश्तों को कुछ परिस्थितियों में कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। इसमें घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का भी उल्लेख किया गया।
फैसले का संदेश क्या है?
इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी का सबसे अहम पहलू यह है कि वयस्कों की सहमति से बने निजी रिश्ते में परिवार की असहमति अपने आप हस्तक्षेप का अधिकार नहीं देती। यदि किसी कपल को रिश्ते के कारण धमकी या हिंसा का खतरा है, तो राज्य की जिम्मेदारी उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
हालांकि, इस आदेश को हर लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह के बिल्कुल समान कानूनी दर्जा देने वाला फैसला समझना उचित नहीं होगा। अदालत की टिप्पणी मुख्य रूप से सहमति से साथ रह रहे वयस्कों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा के संदर्भ में है।
निष्कर्ष:
दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी वयस्कों की व्यक्तिगत पसंद, स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण है। अदालत ने साफ संदेश दिया कि सहमति से साथ रहने वाले वयस्कों को केवल पारिवारिक या सामाजिक असहमति के कारण धमकाया या परेशान नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में कानून का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा करना है।

