वाराणसी। धर्म, जाति और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की एक प्रेरणादायक तस्वीर काशी से सामने आई है। वाराणसी स्थित ऐतिहासिक पातालपुरी मठ में आयोजित विशेष गुरुदीक्षा समारोह के दौरान मुस्लिम और आदिवासी समाज के लोगों ने न केवल जगद्गुरु बालक देवाचार्य जी महाराज से दीक्षा ग्रहण की, बल्कि मुस्लिम शिष्यों ने विधिवत अपने गुरु की आरती उतारी और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद भी लिया। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए सामाजिक समरसता, सद्भाव और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण बन गया।
गुरु-शिष्य परंपरा में नहीं होता धर्म और जाति का भेद
भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक माना जाता है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए पातालपुरी मठ में आयोजित कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ शामिल हुए। आयोजन के दौरान मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि जाकिर पाण्डेय और अफरोज पाण्डेय के नेतृत्व में आए लोगों ने जगद्गुरु बालक देवाचार्य की विधिवत आरती उतारी। इसके बाद सभी ने गुरु के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
कार्यक्रम में कई नए सदस्यों ने रामानंदी परंपरा के अनुसार गुरुदीक्षा भी ग्रहण की। जगद्गुरु ने सभी को बिना किसी भेदभाव के समान भाव से आशीर्वाद दिया।
रामपंथाचार्य ने बताया ऐतिहासिक परिवर्तन
इस अवसर पर रामपंथ के पंथाचार्य डॉ. राजीव श्रीगुरुजी ने कहा कि यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य संबंध कभी धर्म, जाति या सामाजिक पहचान से बंधा नहीं रहा।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब समाज कई तरह के विभाजनों का सामना कर रहा है, तब इस तरह के आयोजन सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देते हैं। उनके अनुसार, जीवन में गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति के विचार और व्यवहार दोनों को सकारात्मक दिशा देता है।

जगद्गुरु बोले- मेरे हजारों मुस्लिम शिष्य हैं
जगद्गुरु बालक देवाचार्य जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा में किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि उनके हजारों मुस्लिम शिष्य हैं और यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है।
उन्होंने कहा कि कई मुस्लिम परिवारों के पूर्वज भी रामानंदी संप्रदाय से जुड़े रहे हैं और आज भी उनके वंशज उसी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। गुरु का कार्य समाज को जोड़ना, भेदभाव मिटाना और सभी को समान दृष्टि से स्वीकार करना है।
जगद्गुरु ने कहा कि भारतीय संस्कृति किसी भी प्रकार के ऊंच-नीच, छुआछूत या धार्मिक भेदभाव को स्वीकार नहीं करती। रामपंथ में हर व्यक्ति का स्वागत है, चाहे उसका धर्म, जाति, भाषा या सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
सामाजिक समरसता का दिया संदेश
कार्यक्रम में दलित विचारक ज्ञान प्रकाश, आदिवासी समाज के धर्मगुरु द्वारिका प्रसाद तथा मुस्लिम समाज के सामाजिक कार्यकर्ता नौशाद अहमद दूबे ने भी भाग लिया। सभी ने जगद्गुरु बालक देवाचार्य का रामनामी दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मान किया और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का संदेश दिया।
वक्ताओं ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान विविधता में एकता रही है। गुरु-शिष्य परंपरा भी इसी भावना को मजबूत करती है, जहां व्यक्ति की पहचान उसके धर्म से नहीं बल्कि उसके संस्कार और आचरण से होती है।
बड़ी संख्या में पहुंचे विभिन्न समाजों के लोग
इस आयोजन में प्रभु रामदास जी, जगदीश्वर दास जी, डॉ. अर्चना भारतवंशी, डॉ. नजमा परवीन, नाज़नीन अंसारी, डॉ. मृदुला जायसवाल, कलीम, लियाकत, गुलाब अली, आफताब आलम, सलीम अंसारी, अब्दुल्ला दूबे सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम में मुस्लिम, आदिवासी, दलित और अन्य समाजों की सहभागिता ने यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति की जड़ें समावेशी हैं और गुरु-शिष्य परंपरा समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम बनी हुई है।
भारतीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण
धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर आयोजित यह समारोह केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनकर सामने आया। काशी की इस अनोखी तस्वीर ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भारतीय परंपराओं का मूल आधार प्रेम, सम्मान, स्वीकार्यता और मानवता है।
निष्कर्ष
वाराणसी के पातालपुरी मठ में आयोजित यह गुरुदीक्षा समारोह भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को मजबूत करता है, जिसमें गुरु और शिष्य का संबंध किसी धर्म, जाति या समुदाय की सीमाओं में बंधा नहीं होता। मुस्लिम शिष्यों द्वारा गुरु की आरती उतारना और सभी समुदायों का एक मंच पर आना सामाजिक समरसता, भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का प्रेरणादायक संदेश देता है।

