पटना। बिहार की राजनीति में पुराने राजनीतिक रिश्तों और घटनाओं से जुड़े किस्से अक्सर मौजूदा सियासत में फिर चर्चा का विषय बन जाते हैं। ऐसा ही एक मामला इन दिनों सामने आया है। वरिष्ठ समाजवादी नेता और कभी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे शिवानंद तिवारी ने लालू यादव के एक पुराने दावे पर सवाल खड़ा किया है।
शिवानंद तिवारी ने सोशल मीडिया पर जनवरी 2015 में लालू यादव के दिए एक इंटरव्यू का जिक्र करते हुए दावा किया कि कुर्मी चेतना रैली में नीतीश कुमार के पहुंचने की कहानी वैसी नहीं थी, जैसी लालू यादव ने उस इंटरव्यू में बताई थी।
तिवारी ने अपने पोस्ट में बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “इतना बड़ा झूठ लालू ही बोल सकते हैं।” हालांकि, यह शिवानंद तिवारी का आरोप और उनके द्वारा बताया गया घटनाक्रम है।
क्या था लालू यादव का दावा?
शिवानंद तिवारी के मुताबिक, 2015 में दिए गए एक इंटरव्यू में लालू यादव ने कहा था कि कुर्मी चेतना रैली में नीतीश कुमार को उन्होंने ही भेजा था।
तिवारी ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि रैली के दिन की परिस्थितियां उन्हें अच्छी तरह याद हैं और नीतीश कुमार को रैली तक पहुंचाने में उनकी स्वयं की भूमिका थी।
उनके मुताबिक, नीतीश कुमार उस समय उनके साथ थे और दोनों पहले लालू यादव से मिलने गए थे।
‘मेरी ही गाड़ी थी और मैं ही ड्राइवर था’
शिवानंद तिवारी ने अपने पोस्ट में दावा किया कि कुर्मी चेतना रैली के दिन वह खुद नीतीश कुमार के साथ थे। उन्होंने कहा कि जिस गाड़ी से दोनों गांधी मैदान पहुंचे, वह उनकी ही थी और गाड़ी भी वही चला रहे थे।
तिवारी के अनुसार, लालू यादव उस समय नहीं चाहते थे कि नीतीश कुमार कुर्मी चेतना रैली में जाएं। हालांकि, उन्होंने सीधे तौर पर नीतीश कुमार को रैली में जाने से मना नहीं किया।
इसके बजाय लालू यादव ने कथित तौर पर अपने अनुभव का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें भी कई जगहों से इस तरह की रैलियों में शामिल होने का निमंत्रण मिलता है, लेकिन वह ऐसी रैलियों में नहीं जाते।
शिवानंद तिवारी ने इसे नीतीश कुमार को रैली में जाने से रोकने की अप्रत्यक्ष कोशिश के तौर पर पेश किया।
नीतीश कुमार क्यों असमंजस में थे?
तिवारी के अनुसार, लालू यादव से मुलाकात के बाद वे और नीतीश कुमार वहां से निकले और नीतीश कुमार के फ्लैट पर पहुंचे।
उनका दावा है कि नीतीश कुमार उस समय काफी असमंजस में थे। वह रैली में जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह चिंता थी कि अगर रैली सफल नहीं हुई तो उसका राजनीतिक असर क्या होगा।
इसी दौरान शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार से सवाल किया कि अगर जनता गांधी मैदान में मौजूद है और नेता अपने घर में बैठा है तो इसका क्या अर्थ है?
तिवारी के मुताबिक, उन्होंने नीतीश कुमार को यह समझाने की कोशिश की कि जनता और नेतृत्व के बीच दूरी नहीं होनी चाहिए।

रैली की तैयारी को लेकर क्या कहा?
शिवानंद तिवारी ने दावा किया कि कुर्मी चेतना रैली की तैयारी सामान्य राजनीतिक आयोजन की तरह नहीं हुई थी। उनके अनुसार, रैली के पीछे काम कर रहे लोगों ने व्यवस्थित तरीके से इसकी तैयारी की थी।
उन्होंने कहा कि रैली की तैयारियों की जानकारी लगातार नीतीश कुमार तक भी पहुंचाई जा रही थी। ऐसे में नीतीश कुमार के मन में रैली में जाने को लेकर रुचि थी, लेकिन अंतिम निर्णय को लेकर वह कुछ संकोच में थे।
तिवारी के मुताबिक, उनकी बातचीत के बाद नीतीश कुमार ने आखिरकार कहा—“चलिए, चला जाए।”
इसके बाद दोनों उसी गाड़ी से गांधी मैदान की ओर रवाना हुए।
गांधी मैदान पहुंचते ही बदल गया माहौल?
शिवानंद तिवारी ने बताया कि गांधी मैदान में उनकी गाड़ी मंच के पीछे पहुंची। उस समय मंच पर भोला बाबू का भाषण चल रहा था।
तिवारी के दावे के अनुसार, उस समय मंच पर नीतीश कुमार के नाम का विरोध भी हो रहा था। उनके मुताबिक, कुछ लोग नीतीश कुमार का नाम लिए जाने का विरोध कर रहे थे और माहौल में उनके खिलाफ नाराजगी दिखाई दे रही थी।
लेकिन इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला।
‘नीतीश ने महफिल लूट ली’
शिवानंद तिवारी के मुताबिक, जैसे ही नीतीश कुमार मंच पर पहुंचे, रैली का माहौल बदल गया।
उन्होंने अपने पोस्ट में दावा किया कि नीतीश कुमार ने वहां मौजूद लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई और कुर्मी समाज के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में अपनी स्थिति मजबूत कर ली।
तिवारी ने इसी घटनाक्रम को आधार बनाते हुए कहा कि कुर्मी चेतना रैली में नीतीश कुमार के पहुंचने की वास्तविक कहानी लालू यादव के 2015 के कथित बयान से अलग थी।
पुराना राजनीतिक रिश्ता फिर चर्चा में
शिवानंद तिवारी और लालू प्रसाद यादव लंबे समय तक बिहार की समाजवादी राजनीति में साथ रहे हैं। तिवारी राजद के वरिष्ठ नेताओं में भी शामिल रहे और पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।
यही वजह है कि उनके द्वारा लालू यादव के पुराने बयान पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए जाने को बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस पूरे विवाद का एक पहलू राजनीतिक इतिहास से जुड़ा है, जबकि दूसरा पहलू दोनों नेताओं के पुराने संबंधों से जुड़ा हुआ है। तिवारी का दावा है कि उन्होंने जिस घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखा, उसका विवरण लालू यादव के पुराने इंटरव्यू में अलग तरीके से पेश किया गया।
बिहार की राजनीति में पुराने किस्सों की वापसी
बिहार की राजनीति में लालू यादव और नीतीश कुमार के संबंध कई दशकों से उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं। दोनों नेता अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में कभी सहयोगी रहे तो कभी एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दिए।
कुर्मी चेतना रैली को भी बिहार की पिछड़ा वर्ग राजनीति के महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है। ऐसे में शिवानंद तिवारी का यह दावा उस दौर की राजनीतिक घटनाओं और नीतीश कुमार की शुरुआती राजनीतिक पहचान को लेकर एक बार फिर चर्चा छेड़ रहा है।
हालांकि, इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग नेताओं और पक्षों की व्याख्या अलग हो सकती है। फिलहाल तिवारी ने अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर लालू यादव के पुराने दावे को चुनौती दी है।
निष्कर्ष
शिवानंद तिवारी के ताजा बयान ने बिहार की राजनीति के एक पुराने घटनाक्रम को फिर चर्चा में ला दिया है। उन्होंने 2015 के लालू यादव के कथित इंटरव्यू का हवाला देते हुए कुर्मी चेतना रैली में नीतीश कुमार के पहुंचने की कहानी पर सवाल उठाया और दावा किया कि वह खुद नीतीश कुमार को अपनी गाड़ी से गांधी मैदान लेकर गए थे।
उनका यह बयान फिलहाल उनके द्वारा बताए गए घटनाक्रम और दावे पर आधारित है। राजनीतिक रूप से देखें तो यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें बिहार की पिछड़ा वर्ग राजनीति, लालू यादव-नीतीश कुमार के पुराने संबंध और उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियां एक साथ जुड़ी हुई हैं।

