नई दिल्ली: नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत याचिका पर तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि केवल तब ही जमानत पर विचार किया जाएगा, जब उनकी स्वास्थ्य स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाए या उनके जीवन को वास्तविक खतरा उत्पन्न हो।
हालांकि अदालत ने राजस्थान सरकार को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही जेल प्रशासन को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि आसाराम को आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में क्या कहा?
मंगलवार को न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल सजा पर रोक लगाने या नियमित जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।
पीठ ने कहा कि राज्य सरकार का पक्ष सुनने के बाद ही मामले में आगे का निर्णय लिया जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि भविष्य में चिकित्सा संबंधी कोई गंभीर आपात स्थिति उत्पन्न होती है या जीवन को खतरा साबित होता है, तभी जमानत पर विचार किया जा सकता है।
जमानत क्यों नहीं मिली?
सुनवाई के दौरान आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने दलील दी कि उनके मुवक्किल की उम्र 80 वर्ष से अधिक है और वे कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल अधिक उम्र या सामान्य स्वास्थ्य समस्याएं जमानत देने का पर्याप्त आधार नहीं हैं। अदालत ने दोहराया कि किसी भी राहत पर विचार तभी होगा, जब चिकित्सा स्थिति असाधारण रूप से गंभीर हो।

राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
इससे पहले 27 मई को राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था।
हालांकि हाईकोर्ट ने उन्हें सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो कानून की कुछ धाराओं से राहत दी थी, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एफ) के तहत नाबालिग से दुष्कर्म के अपराध में दोषी मानते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को यथावत रखा।
किन आरोपों में दोषी हैं आसाराम?
राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम को कई गंभीर अपराधों में दोषी माना है। इनमें नाबालिग से दुष्कर्म, गलत तरीके से बंधक बनाना, आपराधिक धमकी, महिला की गरिमा का अपमान, यौन उत्पीड़न तथा पॉक्सो अधिनियम की संबंधित धाराएं शामिल हैं।
इसके अलावा किशोर न्याय अधिनियम की धारा 23 के तहत भी उनकी सजा बरकरार रखी गई है। हालांकि अदालत ने आपराधिक साजिश और सामूहिक दुष्कर्म से जुड़ी कुछ धाराओं से उन्हें राहत दी थी। वहीं सह-आरोपी संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी और शरत चंद्र को हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2013 का है। आरोप है कि आसाराम ने अपने आश्रम में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म किया था।
लंबी सुनवाई के बाद 25 अप्रैल 2018 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली।
अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है।
जेल प्रशासन को क्या निर्देश मिले?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आसाराम की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा जाए और उन्हें समय पर उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैदी होने के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक चिकित्सा सुविधा मिलना उसका अधिकार है।
आगे क्या होगा?
अब राजस्थान सरकार दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करेगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट मामले की अगली सुनवाई करेगा।
फिलहाल आसाराम को नियमित जमानत नहीं मिली है और उनकी उम्रकैद की सजा प्रभावी बनी हुई है। अदालत के अगले आदेश तक उन्हें जेल में ही रहना होगा, जबकि चिकित्सा सुविधाओं को लेकर अदालत की निगरानी जारी रहेगी।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल उम्र या सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने फिलहाल राहत देने से इनकार करते हुए कहा है कि यदि भविष्य में स्वास्थ्य स्थिति अत्यंत गंभीर होती है या जीवन को वास्तविक खतरा होता है, तभी जमानत पर विचार किया जाएगा। अब सभी की नजर राजस्थान सरकार के जवाब और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर रहेगी।

