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Home - दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! ‘फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार’, सड़कों पर अब पैदल यात्रियों का हक सबसे ऊपर

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! ‘फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार’, सड़कों पर अब पैदल यात्रियों का हक सबसे ऊपर

Rajat Kumar
Last updated: 2026/06/19 at 5:49 PM
Rajat Kumar
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4 Min Read
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फुटपाथ पर चलना भी है मौलिक अधिकार

देश: की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में शहरी विकास, सड़क सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की दिशा बदल सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित तरीके से चलना केवल एक सुविधा नहीं बल्कि भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

Contents
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फुटपाथ पर चलना भी है मौलिक अधिकारपांच साल के मासूम की मौत से जुड़ा है मामलामुआवजे की राशि भी बढ़ाईसंविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हवालाफुटपाथ बनाना और उनका रखरखाव प्रशासन की जिम्मेदारीअब मुआवजे के लिए अलग से मुकदमा भी संभवशहरों की प्लानिंग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंतासड़क सुरक्षा को मिलेगा नया आयामनिष्कर्ष

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सड़कों पर पैदल चलने वालों का अधिकार मोटर वाहनों की सुविधा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य और स्थानीय प्रशासन की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों के लिए सुरक्षित और सुव्यवस्थित फुटपाथ उपलब्ध कराएं।

पांच साल के मासूम की मौत से जुड़ा है मामला

यह महत्वपूर्ण फैसला एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में आया। मामला एक पांच वर्षीय बच्चे की मौत से संबंधित था। जानकारी के अनुसार, बच्चा अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था, तभी पीछे से आ रहे एक टैंकर ने उसे टक्कर मार दी।

दुर्घटना में बच्चे को गंभीर चोटें आईं और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। अदालत ने गौर किया कि जिस स्थान पर हादसा हुआ वहां न तो कोई फुटपाथ था और न ही पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग की व्यवस्था।

इसी तथ्य को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि सुरक्षित फुटपाथ और पैदल मार्ग उपलब्ध होते तो संभवतः ऐसी दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था।

मुआवजे की राशि भी बढ़ाई

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृत बच्चे के पिता को मिलने वाले मुआवजे की राशि बढ़ाकर 11.44 लाख रुपये कर दी। साथ ही अदालत ने दो महीने के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का आदेश भी दिया।

इसके अलावा अदालत ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें पहले मुआवजे की राशि कम कर दी गई थी।

संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हवाला

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) और अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।

अनुच्छेद 19(1)(d) नागरिकों को देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

अदालत ने कहा कि सुरक्षित तरीके से चलना और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच बनाना जीवन की गरिमा से जुड़ा हुआ अधिकार है। इसलिए इसे मौलिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए।

फुटपाथ बनाना और उनका रखरखाव प्रशासन की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जहां भी सड़क हो, वहां पैदल यात्रियों के लिए अलग फुटपाथ होना चाहिए। केवल फुटपाथ बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका नियमित रखरखाव भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

पीठ ने कहा कि यह कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बल्कि एक प्रवर्तनीय कानूनी दायित्व है। यदि प्रशासन इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं करता है तो प्रभावित नागरिक कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।

अब मुआवजे के लिए अलग से मुकदमा भी संभव

फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यदि किसी नागरिक के पैदल चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह संबंधित सरकारी एजेंसियों के खिलाफ अलग से कानूनी दावा कर सकता है।

अदालत ने कहा कि यह अधिकार मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाले मुआवजे से अलग होगा। यानी दुर्घटना पीड़ित या उनके परिवार प्रशासनिक लापरवाही के लिए अलग से हर्जाने की मांग कर सकते हैं।

शहरों की प्लानिंग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

अदालत ने भारतीय शहरों की मौजूदा योजना प्रणाली पर भी चिंता जताई। न्यायाधीशों ने कहा कि अधिकांश शहरों का विकास मोटर वाहनों को केंद्र में रखकर किया गया है, जबकि पैदल यात्रियों की जरूरतों को नजरअंदाज किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहिए के आविष्कार से बहुत पहले से मनुष्य पैदल चलता आ रहा है। इसलिए सड़कों पर पैदल चलने का अधिकार किसी भी वाहन के अधिकार से पहले आता है।

सड़क सुरक्षा को मिलेगा नया आयाम

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत में सड़क सुरक्षा नीतियों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों और राज्य सरकारों पर दबाव बढ़ेगा कि वे शहरों में सुरक्षित फुटपाथ, पैदल पारपथ और सार्वजनिक आवागमन की बेहतर व्यवस्था विकसित करें।

यह निर्णय विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों, दिव्यांगजनों और रोजाना पैदल यात्रा करने वाले लाखों लोगों के लिए राहत लेकर आया है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों और मानवीय गरिमा की रक्षा की दिशा में बड़ा कदम है। अदालत ने साफ कर दिया है कि विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें और तेज रफ्तार वाहन नहीं, बल्कि सुरक्षित पैदल यात्री भी हैं। आने वाले समय में यह निर्णय देशभर में सड़क और शहरी विकास की नीतियों को प्रभावित कर सकता है।

TAGGED: अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 21, कानूनी समाचार, पैदल यात्री अधिकार, फुटपाथ, भारत, सड़क सुरक्षा, संविधान, सुप्रीम कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट फैसला
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