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Home - राजनीति - 850 सीटों का फॉर्मूला क्या है? संसद में अमित शाह ने खोला पूरा गणित; दक्षिण बनाम उत्तर की बहस तेज

850 सीटों का फॉर्मूला क्या है? संसद में अमित शाह ने खोला पूरा गणित; दक्षिण बनाम उत्तर की बहस तेज

Rajat Kumar
Last updated: 2026/04/17 at 7:33 AM
Rajat Kumar
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4 Min Read
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देश: की राजनीति में इन दिनों लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर बड़ा विवाद छिड़ा हुआ है। संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 किए जाने के प्रस्ताव पर विस्तार से जानकारी दी। उनके इस बयान के बाद जहां एक ओर सरकार ने इसे संतुलित सुधार बताया, वहीं विपक्ष ने इसे ‘राजनीतिक रणनीति’ करार दिया।

Contents
850 सीटों का गणित क्या है?दक्षिण भारत को कितना फायदा?किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा?विपक्ष के सवाल और आपत्तियांक्या बदलेगा परिसीमन में?निष्कर्ष:

दरअसल, विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन की प्रक्रिया से उत्तर भारत के राज्यों को अधिक फायदा होगा, जबकि दक्षिण भारत के राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस पर जवाब देते हुए अमित शाह ने साफ कहा कि “किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा” और यह पूरी प्रक्रिया संविधान और मौजूदा कानूनों के तहत ही की जाएगी।

850 सीटों का गणित क्या है?

अमित शाह ने लोकसभा में बेहद सरल तरीके से समझाया कि सीटों की संख्या 850 तक कैसे पहुंच सकती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वर्तमान 543 सीटों में 50% की वृद्धि की जाती है, तो यह संख्या लगभग 816 हो जाएगी। इसके बाद जब 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी, तो कुल संख्या करीब 850 के आसपास पहुंचती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि 850 एक राउंड फिगर है, जबकि वास्तविक संख्या 816 के करीब होगी। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद महिला आरक्षण को लागू करना और प्रतिनिधित्व को संतुलित बनाना है।

दक्षिण भारत को कितना फायदा?

गृह मंत्री ने यह भी बताया कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत के राज्यों को भी पर्याप्त लाभ मिलेगा। वर्तमान में दक्षिण के पांच राज्यों—तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक—की कुल 129 सीटें हैं, जो बढ़कर 195 हो जाएंगी।

  • तमिलनाडु: 39 से 59 सीटें
  • केरल: 20 से 30 सीटें
  • आंध्र प्रदेश: 25 से 38 सीटें
  • तेलंगाना: 17 से 26 सीटें

इस तरह दक्षिण भारत का कुल प्रतिनिधित्व प्रतिशत 23.76% से बढ़कर 23.87% हो जाएगा, यानी उनका हिस्सा लगभग स्थिर रहेगा।

किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा?

परिसीमन के बाद सबसे ज्यादा फायदा उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों को मिलने की संभावना है। उत्तर प्रदेश पहले से ही सबसे ज्यादा सीटों वाला राज्य है, और इसमें और वृद्धि हो सकती है। वहीं महाराष्ट्र को करीब 24 अतिरिक्त सीटें मिलने का अनुमान है।

सरकार का तर्क है कि यह वृद्धि जनसंख्या के आधार पर होगी, जिससे प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित होगा। हालांकि विपक्ष का कहना है कि इससे जनसंख्या अधिक वाले राज्यों को disproportionate लाभ मिलेगा।

विपक्ष के सवाल और आपत्तियां

इस मुद्दे पर कई विपक्षी नेताओं ने सरकार को घेरा।

प्रियंका गांधी ने सवाल उठाया कि जब 543 सीटों में ही 33% महिला आरक्षण दिया जा सकता है, तो नई सीटों की जरूरत क्यों है।
असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि दक्षिणी राज्यों को उनके बेहतर जनसंख्या नियंत्रण के लिए ‘सजा’ दी जा रही है।
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि परिसीमन की प्रक्रिया राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल की जा रही है।
वहीं डीएमके नेता टी आर बालू ने इन संशोधनों को ‘सैंडविच बिल’ बताते हुए विरोध किया।

क्या बदलेगा परिसीमन में?

सरकार के अनुसार, परिसीमन की प्रक्रिया पूरी तरह मौजूदा कानूनों के अनुसार होगी। इसमें संविधान के अनुच्छेद 55, 81, 82, 170, 330, 332 और 334 (A) में संशोधन प्रस्तावित हैं। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं 2011 की जनगणना के आधार पर तय की जाएंगी।

अमित शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका वर्तमान चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह भविष्य के लिए एक संरचनात्मक बदलाव है।


निष्कर्ष:

लोकसभा सीटों का परिसीमन सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की राजनीति और प्रतिनिधित्व का बड़ा सवाल बन गया है। जहां सरकार इसे संतुलित विकास की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक लाभ से जोड़कर देख रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा और ज्यादा गर्माने की संभावना है।

TAGGED: Amit Shah, Census 2011, Delimitation, Indian Politics, Lok Sabha Seats, North vs South Debate, Parliament News, Women Reservation Bill
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