बिहार NDA और RJD में क्या कोई फर्क बचा है? परिवारवाद पर छिड़ी नई बहस
पटना। बिहार की राजनीति में परिवारवाद (Dynasty Politics) कोई नया मुद्दा नहीं है। वर्षों से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और उसके प्रमुख परिवार को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठाते रहे हैं। खासकर NDA के नेताओं ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को राजनीति में वंशवाद का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है। लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या बिहार NDA खुद परिवारवाद की उसी राह पर नहीं चल पड़ा है, जिस पर चलने के लिए वह RJD की आलोचना करता रहा है?
हाल के घटनाक्रमों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि बिहार NDA में भी नेताओं के रिश्तेदारों और परिजनों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने की होड़ मची हुई है। ऐसे में जनता के बीच यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि आखिर NDA और RJD के राजनीतिक चरित्र में अंतर क्या रह गया है।
परिवारवाद पर हमेशा घिरता रहा RJD
बिहार की राजनीति में RJD लंबे समय से परिवारवाद के आरोपों का सामना करता रहा है। लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और मीसा भारती जैसे नेताओं का एक ही परिवार से होना विपक्ष के लिए हमेशा बड़ा मुद्दा रहा।
भाजपा और NDA के अन्य दल अक्सर यह कहते रहे हैं कि RJD में संगठन से ज्यादा परिवार का महत्व है। लेकिन अब वही सवाल NDA के सामने भी खड़ा दिखाई दे रहा है।
NDA में भी बढ़ रहे परिवारवाद के उदाहरण
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार NDA में कई ऐसे चेहरे हैं जिनकी राजनीतिक पहचान उनके पारिवारिक संबंधों से जुड़ी हुई है।
सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक भूमिका को लेकर हो रही है। इसके अलावा राष्ट्रीय लोकमोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश, आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के कई नेताओं के रिश्तेदार भी सक्रिय राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर हैं।
विपक्ष का दावा है कि यदि परिवारवाद गलत है, तो उसके खिलाफ समान मानदंड लागू होने चाहिए, चाहे वह RJD हो या NDA।

नरेंद्र मोदी का उदाहरण क्यों दिया जा रहा?
इस बहस के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण भी सामने लाया जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन में कभी परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया।
जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब भी उन्होंने खुद चुनाव लड़कर अपनी वैधता साबित की। यही कारण है कि भाजपा की केंद्रीय राजनीति में मोदी को परिवारवाद के खिलाफ एक मजबूत चेहरा माना जाता है।
लेकिन बिहार भाजपा और NDA के कई सहयोगी दलों में जिस तरह रिश्तेदारों को टिकट और पद दिए जा रहे हैं, उससे पार्टी के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं।
चिराग पासवान और अन्य नेताओं पर भी चर्चा
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा चेहरा हैं। उनके परिवार और रिश्तेदार भी सक्रिय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई देते हैं।
इसी तरह कई अन्य NDA नेताओं के बेटे, बेटियां, दामाद और रिश्तेदार विधानसभा, विधान परिषद और लोकसभा तक पहुंच चुके हैं। यही वजह है कि विपक्ष अब NDA पर “डबल स्टैंडर्ड” अपनाने का आरोप लगा रहा है।
क्या जनता के लिए मुद्दा बनेगा परिवारवाद?
बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही परिवारवाद का मुद्दा फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकता है। विपक्ष इसे NDA के खिलाफ बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में है, जबकि NDA का तर्क है कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि किसी नेता का परिजन चुनाव जीतकर आता है तो उसे केवल परिवारवाद कहना पर्याप्त नहीं होगा। लेकिन जब संगठनात्मक प्रक्रिया को दरकिनार कर रिश्तेदारों को प्राथमिकता दी जाती है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
चुनावी राजनीति में बढ़ेगी बहस
आने वाले महीनों में बिहार की राजनीति और भी दिलचस्प हो सकती है। एक तरफ NDA खुद को विकास और सुशासन का प्रतीक बताने की कोशिश करेगा, तो दूसरी तरफ विपक्ष परिवारवाद और पद वितरण के मुद्दे पर उसे घेरने का प्रयास करेगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो गठबंधन वर्षों तक RJD पर परिवारवाद का आरोप लगाता रहा, वह अपने भीतर उठ रहे ऐसे सवालों का जवाब कैसे देगा।
निष्कर्ष
बिहार की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। RJD लंबे समय से इस आरोप का सामना करती रही है, लेकिन अब NDA भी इसी बहस के घेरे में दिखाई दे रहा है। आने वाले चुनावों में यह मुद्दा राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे की बड़ी परीक्षा बन सकता है। जनता अब यह देखना चाहती है कि राजनीतिक दल सिद्धांतों की राजनीति करते हैं या केवल अवसर के अनुसार मुद्दे बदलते हैं।

