बॉलीवुड और भारतीय संस्कृति: भारतीय सिनेमा के सामने हमेशा से यह सवाल रहा है कि वह दर्शकों को केवल मनोरंजन देता है या समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों और लोक परंपराओं को भी पर्दे पर जगह देता है। पिछले कुछ समय में धार्मिक, आध्यात्मिक और भारतीय लोककथाओं से जुड़ी कहानियों को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ी है। इसी कड़ी में कम बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ की बॉक्स ऑफिस सफलता ने फिल्म इंडस्ट्री में नई चर्चा को जन्म दिया है।
करीब 2 करोड़ रुपये के रिपोर्टेड बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ ने 40 दिनों में दुनिया भर में करीब 291.40 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया था। बाद की रिपोर्टों में इसका घरेलू कारोबार 325 करोड़ रुपये से आगे पहुंचने की बात भी सामने आई। फिल्म की सफलता को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि यह किसी बहुत बड़े स्टार या भारी-भरकम बजट के सहारे नहीं, बल्कि आध्यात्मिक कहानी के दम पर दर्शकों तक पहुंची।

क्या बदल रहा है बॉलीवुड का कहानी कहने का तरीका?
भारतीय सिनेमा में धार्मिक और पौराणिक कहानियों की परंपरा नई नहीं है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे टेलीविजन धारावाहिकों ने पहले भी करोड़ों दर्शकों को भारतीय धार्मिक कथाओं से जोड़ा था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में शहरी रिश्तों, अपराध, रोमांस और मनोरंजन-केंद्रित कहानियों का दबदबा बढ़ा।
अब स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है। भारतीय लोककथाओं, देवी-देवताओं, आध्यात्मिकता और स्थानीय संस्कृति से जुड़ी कहानियों को बड़े पर्दे पर नए तकनीकी स्तर के साथ पेश करने की कोशिश हो रही है।
‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी बदलाव की चर्चा को और तेज करती है। हालांकि किसी एक फिल्म की सफलता के आधार पर पूरे बॉलीवुड के लिए स्थायी बदलाव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन दर्शकों की प्रतिक्रिया ने निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार जरूर दिखाया है।

‘द वन’ में बिहार की लोककथा और वन देवी
अब इसी माहौल के बीच ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’, जिसे कुछ रिपोर्टों में ‘द व्वान’ के नाम से भी लिखा गया है, चर्चा में है। फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया मुख्य भूमिकाओं में हैं और इसका निर्देशन ‘पंचायत’ से जुड़े निर्देशक दीपक मिश्रा ने किया है।
फिल्म की कहानी बिहार के पटना के पास स्थित एक प्राचीन वन देवी मंदिर और उससे जुड़ी लोककथाओं की पृष्ठभूमि पर आधारित बताई गई है। ट्रेलर में रहस्यमयी जंगल, वन देवी, लोकविश्वास और अलौकिक घटनाओं का मिश्रण दिखाई देता है।
फिल्म 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। इसकी टीम हाल में बिहार पहुंची थी और एकता कपूर, सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया तथा निर्देशक दीपक मिश्रा ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात भी की। टीम ने फिल्म की जड़ों को बिहार की मिट्टी और स्थानीय भावना से जुड़ा बताया।

छठ पर्व भी बनेगा कहानी का हिस्सा
‘द वन’ की खासियत यह है कि इसमें बिहार की लोक-संस्कृति और छठ पर्व को भी कहानी के बड़े हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। फिल्म से जुड़ी शुरुआती झलकियों और प्रचार सामग्री में इसका सांस्कृतिक पक्ष दिखाई दिया है।
यानी यहां केवल किसी धार्मिक पात्र को केंद्र में रखने की कोशिश नहीं है, बल्कि एक क्षेत्र की लोक मान्यताओं, त्योहारों और स्थानीय कथाओं को सिनेमाई कहानी के साथ जोड़ने का प्रयास है।

अब सबसे बड़ी चर्चा ‘रामायण’ को लेकर
दूसरी ओर भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पौराणिक प्रोजेक्ट माने जा रहे ‘रामायण’ पर भी लगातार चर्चा है। नितेश तिवारी निर्देशित इस फिल्म में रणबीर कपूर राम, साई पल्लवी सीता और यश रावण की भूमिका में हैं।
फिल्म के बजट को लेकर लंबे समय से 4,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा चर्चा में रहा है। हालांकि यश ने स्पष्ट किया था कि 4,000 करोड़ रुपये केवल एक फिल्म का बजट नहीं, बल्कि दोनों भागों और रिलीज-प्रमोशन समेत पूरे प्रोजेक्ट से जुड़ा आंकड़ा है। इसलिए इसे सीधे एक फिल्म की लागत बताना सही नहीं होगा।
यही वह बिंदु है जहां ‘रामायण’ और ‘हनुमान अंश’ के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। एक तरफ बेहद कम बजट की आध्यात्मिक फिल्म ने दर्शकों का ध्यान खींचा है, तो दूसरी ओर ‘रामायण’ विशाल बजट, बड़े सितारों और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीकी तैयारी के साथ सामने आ रही है।

असली चुनौती सिर्फ VFX नहीं, भाव और कहानी
भारतीय पौराणिक कथाओं की सबसे बड़ी ताकत उनके दृश्य प्रभाव में नहीं, बल्कि उनके भाव, चरित्र और दर्शन में रही है। राम केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय समाज में मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श से जुड़े व्यापक सांस्कृतिक प्रतीक हैं। इसी तरह सीता का चरित्र त्याग, शक्ति और धैर्य की अनेक व्याख्याओं से जुड़ा है।
ऐसे में किसी भी रामायण आधारित फिल्म के लिए चुनौती केवल शानदार VFX तैयार करना नहीं होगी। चुनौती यह भी होगी कि आधुनिक तकनीक और बड़े सिनेमाई कैनवास के बीच मूल कथा की भावनात्मक शक्ति कितनी प्रभावी ढंग से दर्शकों तक पहुंचती है।

क्या यह भारतीय लोककथाओं के नए दौर की शुरुआत है?
‘हनुमान अंश’ की सफलता, ‘द वन’ की लोककथा आधारित कहानी और ‘रामायण’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट एक साथ यह संकेत जरूर देते हैं कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक-लोक कथाओं को लेकर फिल्म निर्माताओं की दिलचस्पी बढ़ी है।
लेकिन किसी फिल्म का अंतिम प्रभाव उसके बजट, स्टारकास्ट या VFX से नहीं, बल्कि दर्शकों की प्रतिक्रिया और कहानी की स्वीकार्यता से तय होगा। ‘द वन’ 25 सितंबर को सिनेमाघरों में पहुंचेगी, जबकि ‘रामायण’ को लेकर दर्शकों की नजर पहले से बनी हुई है।
अब सवाल यही है कि क्या भारतीय लोक और आस्था से जुड़ी कहानियां लंबे समय तक मुख्यधारा के सिनेमा में अपनी जगह मजबूत कर पाएंगी, या यह कुछ सफल फिल्मों तक सीमित रहने वाला दौर साबित होगा? इसका जवाब आने वाली फिल्मों के बॉक्स ऑफिस और दर्शकों की प्रतिक्रिया से ही मिलेगा।


